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परमपूज्य गुरुदेव की 75वीं  वर्षगांठ की पूर्व वेला में दिया गया संदेश

6  मार्च 2021  का ज्ञान प्रसाद -गुरुवर  की धरोहर-  पार्ट 4 

 गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ, ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो! आज रक्षाबंधन का सामूहिक पर्व है। यह संकल्प का पर्व है। कर्त्तव्य-निर्धारण का पर्व है। आज हमारे ध्यान के दो केन्द्र हैं-  एक तो भगवान् जो हमें धक्का देता रहता है और आगे बढ़ाता रहता है। दूसरा भगवान् आप लोग हैं, जो हमारे कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। एक भगवान निराकार है तथा दूसरा साकार है। आप साकार भगवान हैं, जो हमारे कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। हमारी बातों को मानते हैं तथा श्रम करते हैं। हमारे क्रियाकलापों में शामिल रहते हैं। आज हमारी इच्छा हुई कि आपसे अपने मन की बातें  करूँ। तो महाराज जी आप अपना कुशल समाचार बताएँ।

सर्वजन सहयोग मित्रो! हमारे ऊपर भगवान् की छाया है और जब तक वह बनी रहेगी, हमारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। स्वास्थ्य हमारा ठीक है। कुछ  दिन पहले एक पगले व्यक्ति द्वारा वार करने के कारण कुछ चोट लग गयी थी, अब वह ठीक है। सेहत हमारी ठीक है। मन भी ठीक है। साधना भी ठीक है और कुछ कमी रह जाएगी, तो आप लोग कदम बढ़ा देंगे, तो वह भी पूरी हो जाएगी। हमने अब तक बहुत काम किया है। अभी हमारे सामने तो आपको पता नहीं चलता है. परंतु  बाद में पता चलेगा कि हमने काफी काम किया है। हमने पेपरबाजी भी नहीं की  , विज्ञापन भी नहीं किया और  कुछ भी  नहीं किया, परंतु फिर भी  इतना काम ही गया , इतना काम जितना किसी भी  संस्था ने नहीं किया। न केवल हिंदुस्तान में, वरन् उसके बाहर भी बहुत काम किया है। हमने ठोस काम किया है।

मित्रो! हम से मतलब आप सबके द्वारा है। आप हमारे मित्र हैं, सहयोगी हैं। हम एवं आपने मिलकर बहुत बड़ा काम किया है। एकाकी ( अकेले )  भगवान् के लिए भी यह संभव नहीं था। गाँधी जी ने भी अकेले स्वतंत्रता संग्राम नहीं लड़ा था। उनके साथ भी एक सत्याग्रही सेना थी। उसके माध्यम से ही आंदोलन चलाया तथा अंग्रेजों को इस देश से खदेड़ कर   बाहर किया एवं भारत को आजाद कराया। भगवान् बुद्ध के लिए भी अकेले धर्मचक्र प्रवर्तन संभव नहीं था। उन्होंने एक लाख परिव्राजक बनाए और उनके माध्यम से उन्होंने विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। विनोबा ने भूदान का कार्य भी अनेक सर्वोदय कार्यकर्ताओं के सहयोग से किया था। भगवान् राम ने समुद्र को पाटने एवं रावण पर विजय प्राप्त करने का कार्य क्या अकेले  ही किया था? नहीं उसे उन्होंने हनुमान, अंगद, नल-नील आदि वानर एवं भालुओं के सहयोग से पूरा किया था। भगवान् कृष्ण ने महाभारत यानी ग्रेटर इंडिया का कार्य क्या स्वयं अकेले किया था? नहीं यह संभव नहीं था। तो क्या गोवर्धन उन्होंने स्वयं उठा लिया था? नहीं, यह भी संभव नहीं था। यह सब कार्य उन्होंने ग्वाल-बालों के सहयोग से पूरा किया।

हमने मोती चुने हैं :

मोती चुने हैं हमने जगत की परंपरा को जाग्रत एवं जीवंत बनाए रखने के लिए, भगवान् के कार्य को पूरा करने के लिए हमने भी एक संगठन बनाया। आप हमारे साथी एवं सहयोगी हैं। आपको हमने बहुत मुश्किल से ढूँढ़ा है। आपने तो सोचा होगा कि हम पत्रिका के ग्राहक बन गए और गुरुजी के हो गए। नहीं बेटे, हमने आपको हिलाया है, झकझोरा है, प्रेरणा दी है, तब आप आए हैं। आपको हमने बुलाया है। हमने आपके पहले जन्म की बात पर विचार किया, जिसमें देखा कि इनमें संस्कार हैं जो भगवान् का काम कर सकते हैं, उन्हें हमने जगाया है। बहुत से बाबा जी आते हैं और न जाने क्या-क्या बातें बतला कर  जाते हैं। उनकी बातों को कोई सुनता भी नहीं है, परंतु हमारे बारे में आपने ऐसा नहीं किया, आपने हमारी बातों को ध्यान से सुना, हृदय में धारण किया। इसके साथ ही उसे क्रिया में परिणत करने के लिए भी अपना समय, श्रम व बुद्धि  लगाने के लिए तैयार हो गए और आज तक लग रहे हैं। यह बहुत प्रसन्नता की बात है। यह हमारे प्रयास के साथ ही साथ आपके पूर्व जन्म के संस्कार का ही फल है।

मित्रो! शेर का एक बच्चा भेड़ों के बीच में चला गया था और अपने स्वरूप को भूल गया था। जब एक शेर ने उसे उसकी छाया दिखाई और उसका स्वरूप दिखलाया, तो वह जाग्रत हो गया। हम एवं आप दोनों सिंह हैं। भेड़ वह होता है, जो चौबीस घंटे पेट और प्रजनन की बात सोचता है। आप इससे आगे हैं। आपके सहयोग से ही यह मिशन आगे बढ़ पाया है। हमने आपको ढूँढ़ निकाला है। हमने गहरे पानी में डुबकी लगायी है और मोतियों को चुन-चुनकर इकट्ठा किया है। मोती सड़क पर नहीं पड़ा था, जो हमने केवल चुन लिया है। हमने काफी परिश्रम किया है, तब आपको पाया है। आपको बड़ी मुश्किल से जोड़ पाए हैं हम। आपको हमसे जुड़ा रहना चाहिए।

साथियो! आजकल हम सक्षमीकरण साधना में हैं। दनिया के सामने एक बड़ी मुसीबत आ गयी है। उसके समाधान के लिए हमें बड़ा काम करना है। आगे खुशहाली लाने के लिए भी प्रयास करना है। यह प्रयास भागीरथ व गंगा अवतरण एवं दधीचि की हड्डी से वज्र बनाने से कम नहीं है, जो असुरता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हमारा प्रयास उसी स्तर का है। इस महान कार्य को जब हम कर रहे हैं तो आपको हमारा सहयोगी एवं सहभागी अवश्य बनना चाहिए। आपको बनना ही पड़ेगा, चाहे आप मन से करें या बिना मन से।

हमारी साधना के साथ दो काम  करें आपको इसमें क्या करना होगा? हमने आपको दो काम बतलाए हैं। आपको हमने एक बात यह कही है कि 

सूर्योदय के समय एक माला गायत्री महामंत्र का जप आपको अवश्य करना चाहिए, ताकि हमारे इस महापुरश्चरण को-इस योजना को बल मिले। दूसरा हमने आपको यह कहा था कि आपको जब हमसे मिलना हो, बातें करनी हो तो आप बेतार का तार बना लें। सूर्योदय के एक घंटे पहले से सूर्योदय के एक घंटे बाद तक जब आप हमारा चिंतन करेंगे, तो आपको हमारा संदेश, मार्गदर्शन एवं सहयोग मिलेगा। 

इसके अलावा हम आपसे और क्या चाहेंगे। आप हमारे बच्चे हैं, हम जो कर रहे हैं, वही  आप करें, यही हमारी इच्छा है। हम जिस परंपरा पर चले हैं, आपको भी उसी पर चलना चाहिए। मित्रो, हमने ऋषि परंपरा को ग्रहण किया है। हमने साधु-ब्राह्मण का, संत का जीवन ग्रहण किया है। आपको भी वही ग्रहण करना चाहिए। संत वह होता है  जो दुनिया को हिला दे। महात्मा गाँधी, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद सभी  संत थे, जिन्होंने दुनिया को हिला दिया था। आपको भी वैसा ही बनने का प्रयास करना चाहिए। ब्राह्मण अपरिग्रही होता है तथा संत सेवाभावी होता है।अपरिग्रही वह होता है जो लोभ, मोह इत्यादि से मुक्त हो। आपको इन दोनों परंपराओं को कायम रखना चाहिए। हमने यही रास्ता अपनाया है। आप से जितना संभव हो, इसी परंपरा को अपनाने का प्रयत्न करें। आप अपनी निजी महत्त्वाकांक्षा में काट-छाँट करें। आपकी महत्वाकांक्षा कम होनी चाहिए। आपकी इच्छा कम होनी चाहिए। भारत के आम नागरिक की तरह आपका जीवन होना चाहिए। आपको अपने परिवार को ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। जो हैं, उनमें से प्रत्येक सदस्य को स्वावलंबी बनाने का प्रयास करना चाहिए । इससे आपको व उनको दोनों को प्रसन्नता होगी।यदि आप ऐसा कर सकेंगे, तो ही हमारे साथ चल सकेंगे।

बीच में न भागें, उत्साह बनाए रखें :

अभी तो आप इस समय हमारे साथ हैं , जब उत्साह आता है तो चलने लगते हैं और जब उत्साह कम हो जाता है तो मगरमछ  की तरह पानी में जा बैठते हैं। यह पानी के बुलबुले की तरह से काम करना क्या कोई शान की बात है? अगर चलना है, तो फिर चलना ही है, रुकना नहीं। यही शान की बात होगी। हमारे गुरु ने हमारी शान रखी, हम आपकी शान रखेंगे। आप हमारी जिंदगी को देखिए, गाँधी जी की जिंदगी को देखिए, अन्य संतों की जिंदगी को देखिए, जिन्होंने जो संकल्प लिया, जो लक्ष्य बनाया, उसके लिए जीवन के अंत तक डटे रहे। बीच में वह भागे नहीं हैं। अगर बीच-बीच में वह व्यक्ति भागेगा तो वह वापस कैसे आएगा?  महापुरुष आखिरी दम तक अपने उद्देश्य पर डटे रहे, संकल्प पर अडिग रहे, अपने स्थान पर बने रहे। वे बीच में भागे नहीं है। अगर बीच में भागोगे, तो काम कैसे बनेगा? इससे बड़ी मुसीबत होगी। आपको उत्साह आता है, उमंग आती है, तो आप काम करते हैं और जब आपकी हवा निकल जाती तो आप चुपचाप हो जाते हैं। इससे काम कैसे चलेगा? अगर किसी काम को कीजिए, तो पूरा कीजिए। थोडा काम करने से क्या फायदा?

एक ही  लक्ष्य : एक ही चिंतन मित्रो! 

हमने तो हमेशा अर्जुन की तरह तीर की नोंक तथा मछली  की आँख ही देखी हैं। हमें हमेशा अपना लक्ष्य ही  दिखाई पड़ा है। आपको भी जितना बन पड़े, त्याग करना चाहिए, परंतु बीच में काम बंद करके भागना ठीक नहीं है। ढीला-पोला होने में फायदा नहीं है। शानदार आदमी एकनिष्ठ रहते हैं, एक जैसे रहते हैं। आपसे भी जितना बने, मिशन के लिए त्याग करें, महाकाल के लिए त्याग करें। हमारा एक ही निवेदन है कि नवयुग लाने के लिए जनमानस का परिष्कार करना है। इसके लिए आपको बढ़-चढ़कर काम करना है। आपको मुस्तैदी का जीवन जीना चाहिए। आप वैसा बैल न बनें जो रास्ते में बैठ जाता है। आप एक निष्ठा से, एक श्रद्धा से काम करें तथा लगे रहें। इससे आपका, हमारा तथा मिशन का ,तीनों का कल्याण है। हमने अपना सारा जीवन एक ही  लक्ष्य के लिए नियोजित किया है, आप भी अपने सारे जीवन को इसी  लक्ष्य के लिए नियोजित कीजिए।

 हमने आपसे हमारी हीरक जयंती ( Diamond Jubille ) पर  एक बात और कहनी है। अब हम पचहत्तर साल के हो गये। अरे हम तो जब से यह सृष्टि बनी है, तभी से काम कर रहे हैं और जब तक यह रहेगी, हमें काम करना है। हमारी मुक्ति नहीं होगी। इस संसार में जब तक सब मनुष्य मुक्ति नहीं पा लेंगे, हमें मुक्ति की अभिलाषा नहीं है। इस दुनिया के सभी मनुष्य  जब मुक्ति पा लेंगे, तो हम सबसे आखिरी आदमी होंगे, जो मुक्ति की अभिलाषा रखेंगे। मित्रो! यह हीरक जयंती क्या बात है? जब आदमी पचहत्तर वर्ष का हो जाता है, तो यह जयंती मनाई जाती है। सौ साल में शताब्दी मनाई जाती है। अब हमारा यह स्थूल शरीर विद्रोह कर रहा है। हम बहुत दिन जिएंगे नहीं, यह हमारी कामना नहीं है। अब हम सूक्ष्म एवं कारण शरीर में रहकर काम करना चाहते हैं। अब हम पाँच कोषों से, पाँच शरीरों से, पाँच मोर्चों पर लड़ेंगे। हीरक जयंती वसंत पंचमी से शुरू हुई  है और अगले वर्ष तक यह मनाया जाएगी । हमारे पास ढेरों पत्र आए हैं कि गुरुजी हम आपका जुलूस निकालेंगे प्रदर्शनी लगाएंगे। इसी तरह न जाने क्या-क्या पत्र आए हैं। हमने विचार किया कि हमें इस जयंती वर्ष में क्या करना चाहिए? हम यानी हमारे मिशन का विस्तार कैसे हो? जन-चेतना को कैसे जगाया जाए? हमने जुलूस आदि के लिए लोगों को मना कर दिया। इस धूम धड़ाका से कोई लाभ नहीं होगा। हमने एक सौ आठ व एक हजार आठ कुंडीय यज्ञ किए, जो शानदार थे, लेकिन देखा कि उसके दो साल बाद लोग उसे भूल गए। इस तरह इस धूम धड़ाके से कोई लाभ नहीं होता है। अब इससे मेरा मन भर गया है। अभी हम इन्हें नहीं मनाना चाहते। आपको हमारी बात मानना चाहिए। आगे जब जरूरी होगा, हम बता देंगे। अगर आप हमारी इच्छा के अनुसार मनाना  चाहते है तो हमें हीरों के हार पहना दीजिए।  फूलों के हार तो हमें कई किलो और क़्वींटलों तक पहन लिए होंगें।  आप हमारे हीरे मोती हैं।  आप हमारे साथ -साथ चलें तो वही हीरों की माला है। हमने  शक्तिपीठ भी बनाईं  लेकिन उनसे भी मन भर सा गया है। अब यह केवल मंदिर सी बन कर रह गयी है। वहां जन जागृति की कोई बात नहीं है। वहां  देवी बैठी है जिसकी सुबह शाम पूजा हो जाती है।  कायाकल्प की कोई बात नहीं होती है ,इससे मुझे बहुत कष्ट होता है   

क्रमशः जारी ( To be continued )

जयगुरुदेव

परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी  के श्री चरणों में समर्पित

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