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9 फरवरी 1978  को दिया गया गुरुदेव का उद्बोधन -पार्ट 2

27 फरवरी 2021  का ज्ञान प्रसाद 

आज का लेख कल वाले लेख का दूसरा और अंतिम भाग है। गुरुदेव ने यह उद्बोधन 9  फरवरी 1978  को दिया था। और “गुरुवर की धरोहर पार्ट 1” से लिया गया है। 

गायत्री के जो सात लाभ बताए गए हैं- ‘स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयंतां आयुः प्राणं प्रजां पशं कीर्तिम् द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्…..।’ इन्हें हमने सौ फीसदी पाया कि ये सातों के सातों लाभ एक-एक अक्षर करके इसमें सही हैं। यह हमने अपने जीवन की प्रयोगशाला में साबित किया है, अपनी जिंदगी में परीक्षण किया है कि  जो लाभ  गायत्री के बताए गए हैं, सही हैं। इससे मनुष्य की आयु बहुत बड़ी हो जाती है। कितनी बड़ी हो जाती है? बेटे हम कुछ कह नहीं सकते, पर हमारे गुरु के बारे में अपना विश्वास है कि उनकी आयु 600  वर्ष से कम नहीं हो सकती। गायत्री मंत्र का जप करने वाले की आयु बहुत बड़ी हो सकती है। यह तो आप अपने गुरु की बता रहे हैं। तो फिर आपकी उम्र कहाँ रही? बेटे, हमारी उम्र भी  बहुत बड़ी है। हमारी छोटी सी आयु में हमने कम से कम पांच लोगों का कार्य किया है ,तो हुई न पांच गुना आयु। 

पूज्यवर की पांच गुना आयु :

तो अगर गुरुवर 80  वर्ष तक जिए  तो उनकी आयु 400  वर्ष हुई न।  आईये देखें कैसे :  

जितने  ग्रंथ हमने लिखे हैं, अगर एक आदमी जिंदगी में लिखने के अलावा दूसरा कोई काम करना भी चाहे  तो भी नहीं कर सकता।  सारी जिंदगी भर एक आदमी तप करता रहा है। जिंदगी के अधिकांश समय में हमारा 6  घंटे रोज दैनिक उपासना में चला गया। इस तरह एक आदमी  ने पूरा-का-पूरा श्रम गायत्री उपासना में किया। एक आदमी ने संगठन किया है। हमने देश भर का संगठन किया है। हिंदुस्तान में और सारे संसार में जो लोग हमको गुरुजी कहते हैं और जिन्होंने हमें देखा है, जो हमारी बात को सुनते हैं, मानते हैं, जिन्होंने दीक्षा ली है, वे करोडों की तादाद में हो सकते हैं। एक आदमी ने इतना बड़ा संगठन  इतने कम समय  में खड़ा किया हो, मैं समझता हूँ इतिहास में ऐसा उदाहरण कभी नहीं मिला होगा। मरने के बाद तो लोगों ने किए हैं। ईसा के मरने के बाद सेन्टपाल ने ईसाई धर्म का विस्तार किया था, तब फैला था वह धर्म। बुद्ध भगवान का मिशन उनकी जिंदगी में नहीं फैल सका, बहुत थोड़ा-सा था। सम्राट अशोक ने अपना सारा राज्य बुद्ध मिशन के लिए लगाया, तब कहीं उसका विस्तार हुआ। 30  साल में हमने विस्तार की व्यवस्था बनाई है और कोई एक आदमी रह गया है जो हमेशा कहीं और दुनिया में रहता है। संतों के पास रहता है, ज्ञानियों के पास रहता है, तपस्वियों के पास रहता है। उनसे हम गर्मी प्राप्त करते रहते हैं, शक्ति प्राप्त करते रहते हैं, पूछताछ करते रहते हैं। एक और भी हमारा है जो जगह-जगह जाता रहता है। अक्सर लोग कहते हैं कि क्यों साहब, हमने सुना है कि आप वहाँ के यज्ञ में गए थे और लोगों ने देखा था। यह भी हो सकता है। स्थूल ही नहीं, शरीर सूक्ष्म भी होते हैं। सूक्ष्म शरीर से हमको जगह-जगह जाना पड़ता है। जगह-जगह काम करने पड़ते हैं। पाँच व्यक्तियों की  बराबर जिंदगी हमने  जियी और  हो गयी न  पांच गुना आयु। 

प्राण की वृद्धि :

प्राण माने साहस-हिम्मत। हम में बहुत हिम्मत है। कितनी हिम्मत है ? सारे-के-सारे पंडित और पुरातनवादी लोग यह कहते थे कि महिलाओं को गायत्री का जप नहीं करना चाहिए और ब्राह्मण के अलावा किसी को नहीं करना चाहिए। हम अकेले ने कहा कि हर बिरादरी के लोग कर सकते हैं और महिलाएँ भी कर सकती हैं। पंडितों, शंकराचार्य सभी से हमने लोहा लिया। सारी दुनिया में उलटी हवाएँ बह रही हैं, प्रवाह बह रहे हैं, इनको मोड़ देने के लिए हम में बहुत ताकत है। इतनी ताकत है हम में कि जिस तरीके से मछली बहती हुई धारा को छल-छलाती हुई चीरती हुई चली जाती है, उसी तरीके से हम अकेले निकल जाते हैं। कहाँ से आता है यह प्राण? गायत्री में से आता है। गायत्री ने और क्या-क्या दिया? हमको दीर्घजीवन दिया, लंबी आयु दी, प्राण दिया, हिम्मत दे दी, बहादुरी और साहस दे दिया, शक्ति दे दी। प्राण, प्रजा और संतानें दे दी। कितनी संतानें दी हम कह नहीं सकते। हमारी संतानें जहाँ पैदा होती हैं, तो मूछों समेत पैदा होती हैं और लड़कियाँ पैदा होती हैं तो मैट्रिक पास करके पैदा होती हैं। कीर्ति-यश के बारे में हमारे मुँह से शोभा नहीं देता। पर हम एक ही बात कहते हैं कि संसार के पढ़े-लिखे लोगों में से कभी किसी से यह पूछे कि आचार्य जी नाम के कोई व्यक्ति थे, तो वह छूटते ही कहेगा हम जानते हैं उन्हें। हिंदुस्तान ही नहीं, संसार की प्रत्येक लाइब्रेरी में जाइए और जाकर पूछिए कि चारों वेदों के भाष्य आपके यहाँ हैं क्या? उत्तर हाँ में मिलेगा। नास्तिक देशों की बात मैं कहता है। आप पूछिए क्यों साहब, इस नाम के व्यक्ति को आप जानते हैं? हमारा यश किसी सीमा में बँधा नहीं है. संप्रदाय में नहीं है. केवल हिंदू धर्म में नहीं है, वरन सारे विश्व में है। यह यश कहाँ से आ गया। यह बेटे गायत्री माता का दिया हुआ है।

कीर्तिम् द्रविणं धन, यही मत पूछिए कि हमारे पास कितना है? अभी पीछे वाली जमीन खरीदी है और जब अगली बार वसंत पंचमी  पर आप आएँगे तो यहाँ नगर बसा हुआ मिलेगा, महल दिखाई पड़ेगा। महाराज जी धन  कहाँ से लाएँगे? आप हमसे माँगेंगे। नहीं बेटे! मैं तेरे सामने हाथ नहीं फैलाऊँगा। मैंने इंसान के सामने हाथ नहीं पसारा तो तुझसे क्या माँगूंगा? कहाँ से आएगा? बेटे कहीं से आएगा, जमीन फटेगी, आसमान से आएगा। सातवाँ फल-ब्रह्मवर्चस। ब्रह्मवर्चस् कहते हैं तेज को। ब्रह्मतेज कैसा होता है? ब्रह्मतेज उसे कहते हैं-जब विश्वामित्र और वसिष्ठ में संघर्ष हुआ तब विश्वामित्र हार गए और अपना राज्य छोड़कर यह कहने लगे कि वसिष्ठ जितने शक्तिशाली हैं उतना ही शक्तिशाली बनकर मैं भी दिखाऊँगा। उनने एक श्लोक कहा “धिक् बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।” अर्थात् ब्रह्मतेज ही बल है। 

मित्रो  हमें गुरुदेव के इस उद्बोधन को रोक कर राजा  विश्वामित्र और मुनि वशिष्ठ  की कथा का वर्णन करना चाहिए। कथा के उपरांत फिर लेख को जारी रखेंगें। 

 ब्रह्म तेजो बलं बलम् – 

विश्वामित्र तब तक एक क्षत्रिय राजा थे। उनका प्रचंड प्रताप दूर-दूर तक प्रख्यात था। शत्रुओं की हिम्मत उनके सम्मुख पड़ने की न होती थी। दुष्ट उनके दर्प से थर-थर काँपा करते थे। बल में उनके समान दूसरा उस समय कोई  न था। 

एक दिन राजा विश्वामित्र शिकार खेलते खेलते वशिष्ठ मुनि के आश्रम में जा पहुंचे। मुनि ने राजा का समुचित आतिथ्य-सत्कार किया और अपने आश्रम की सारी व्यवस्था उन्हें दिखाई। राजा ने नन्दिनी नामक उस गौ को भी देखा, जिसकी प्रशंसा दूर-दूर देशों में हो रही थी। यह गौ प्रचुर मात्रा में और अमृत के समान गुण दूध तो देती ही थी, साथ ही उसमें और भी दिव्य गुण थे, जिस स्थान पर वह रहती, वहाँ देवता निवास करते और किसी बात का घाटा न रहता। सुन्दरता में अद्वितीय ही थी।

राजा विश्वामित्र का मन इस गौ को लेने के लिए ललचाने लगा। उन्होंने अपनी इच्छा मुनि के सामने प्रकट की, पर उन्होंने मना कर दिया। राजा ने बहुत समझाया और बहुत से धन का लालच दिया पर वशिष्ठ उस गौ को देने के लिए किसी प्रकार तैयार न हुए। इस पर विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया। मेरी एक छोटी सी बात भी यह ब्राह्मण नहीं मानता। यह मेरी शक्ति को नहीं जानता और मेरा तिरस्कार करता है। इन्हीं विचारों से अहंकार और क्रोध उबल आया। रोष में उनके नेत्र लाल हो गये। उन्होंने सिपाहियों को बुलाकर आज्ञा दी कि ‘जबरदस्ती इस गौ को खोल कर ले चलो।  नौकर आज्ञा पालन करने लगे। वशिष्ठ साधारण व्यक्ति न थे। उन्होंने कुटी से बाहर निकल कर निर्भयता की दृष्टि से सब की ओर देखा और कहने लगे। 

 “अकारण मेरी गौ लेने का साहस किसमें है, वह जरा आगे तो आवे।” 

यद्यपि उनके पास अस्त्र-शस्त्र न थे, अहिंसक थे, तो भी उनका आत्मतेज प्रस्फुटित हो रहा था। सत्य पर आरूढ़ और ईश्वर का दृढ़ विश्वासी पुरुष इतना आत्म तेज रखता है कि उसके सामने बड़े-बड़ों को झुकना पड़ता है। विश्वामित्र और उनके सिपाहियों की हिम्मतें पस्त हो गईं। उन्हें लगा कि उनका सारा बल पराक्रम बिदा हो गया है। विश्वामित्र विचार करने लगे। भौतिक वस्तुओं का बल मिथ्या है। तन, धन की शक्ति बहुत ही तुच्छ, अस्थिर और नश्वर है। सच्चा बल तो आत्मबल है। आत्मबल से आध्यात्मिक और पारलौकिक उन्नति तो होती ही है, साथ ही लौकिक शक्ति भी प्राप्त होती है। मैं इतना पराक्रमी राजा-जिसके दर्प को बड़े-बड़े शूर सामन्त सहन नहीं कर सकते। इस ब्राह्मण के सम्मुख हतप्रभ होकर बैठा हूँ और मुझ से कुछ भी बन नहीं पड़ रहा है। निश्चय ही तन बल, धनबल की अपेक्षा आत्मबल अनेकों गुना  शक्ति रखता है। उन्होंने निश्चय कर लिया कि भविष्य में वे सब ओर से मुँह मोड़ कर आत्मसाधना करेंगे और ब्रह्म तेज को प्राप्त करेंगे। ब्रह्म तेज पर वे इतने मुग्ध हुए कि अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा कि-‘धिग् बलं, क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलं बलम्’ क्षत्रिय बल तुच्छ है, बल तो ब्रह्म तेज ही है। विश्वामित्र ने घोर तपस्या की और समयानुसार ब्रह्म तेज को प्राप्त कर लिया।

तो हमने देखा ब्रह्मतेज क्या होता है। आईये उद्बोधन की ओर चलें :

ब्रह्मवर्चस् माने ब्रह्मतेज। इसे ब्राह्मणत्व का तेज कहते हैं, आध्यात्मिक तेज कहते हैं, आत्मा की शक्ति का तेज कहते हैं। गायत्री का आखिरी फल-सातवाँ फल ब्रह्मवर्चस् होता है। गायत्री मंत्र के बारे में हम सारे जीवन भर प्रयत्न करते रहे और सफलता पा ली। आज मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि ऋषियों ने जो कुछ बताया था कि गायत्री भारतीय संस्कृति का बीज है, तो वह सही है। जो शास्त्रकारों ने लिखा है, अन्यान्य उपासकों ने लिखा है, हम आज यह कहने की स्थिति में हैं कि वह सही है। आप कहते हैं या कोई गवाही भी है ? हाँ, बेटे हमारी गवाही है। हमारी जिंदगी के प्रत्येक पन्ने को खोलते चले जाइए वह एक गवाह के रूप में अपना बयान देगा और अपनी हिस्ट्री बताएगा। वह यह बताएगा कि गायत्री की उपासना करते हुए हमने यह पाया और यह किया। तो महाराज हमें भी मिल सकती है? इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है। जो हमारे लिए संभव है, वह आपके लिए भी है। गायत्री आपके ऊपर भी कृपा कर सकती है। सूरज के हम रिश्तेदार नहीं हैं और आपसे कोई बैर नहीं है। आप धूप में खड़े  हो जाइए, सूरज की रोशनी आपको भी मिल सकती है और हम को भी। चंद्रमा की छाया में आप भी बैठ सकते हैं और हम भी। तो आपने कौन-सी विधि से जप किया? कौन-सी विधि से उपासना की? बेटे. हम यही बताने के लिए आज आपके सामने बैठे हैं कि किस विधि से किया। विधि नहीं एक और बात पूछी जाए। क्या? विधा। विधि तो उसे कहते हैं, जो शरीर से और वस्तुओं की सहायता से की जा सकती है।  विधि में हाथ यों जोड़िए, चावल ऐसा नहीं यों रखिए। माला लकड़ी की हो या रुद्राक्ष की। दीपक कैसे रखें? यह सब क्या है? विधि है। कलेवर का नाम विधि है। जिस विधि को आप पूजते हैं, वह आवरण है। आवरण की भी जरूरत पड़ती है, उसके बिना काम नहीं चलता। अगर हमारे पास कलम न हो तो हम चिट्ठी लिख नहीं सकेंगे। बंदूक और तलवार हाथ में हो पर चलाने की विधि न आती हो तो लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। अतः विधि की भी जरूरत है। लेकिन मैं यह कहता हूँ कि विधि तक सीमित रहिए मत। विधि आपको मकसद तक नहीं पहुँचा सकेगी। विधि के सहारे आप जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकेंगे। विधि आपको भगवान तक नहीं पहुंचा सकेगी। विधि के सहारे आप भगवान की कृपा के अधिकारी नहीं बन सकते। तब क्या करना पड़ेगा? विधि के साथ विधा को जानना होगा। विधा का अर्थ  है रीति, कायदा-कानून, नियम और मर्यादा। इसके बिना सफलता नहीं मिल सकती।

ऋषियों ने गायत्री को त्रिपदा कहा है। इसके तीन आधार हैं- श्रद्धा, चरित्र निष्ठा और उदारता, जिसे संकीर्णता या कृपणता का त्याग भी कहते हैं। यह तीन आधार आप पकड लें तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि मेरे तरीके से आपको भी सफलता मिल सकती है। आप भी गायत्री के वैसे ही सिद्ध पुरुष बन सकते हैं जैसे कि महर्षि विश्वामित्र थे और जैसा बनने के लिए मैंने छोटे बच्चे की तरह खुद को समर्पित किया। आपके लिए भी द्वार खुला है मगर त्रिपदा की तीन शर्ते पूरी कर लें तब। इन तीनों के आधार पर हमारी जिंदगी टिकी हुई है। अगर आप गायत्री मंत्र का वह चमत्कार, जो कि ऋषियों को मिला था, उपासकों, ब्राह्मणों और हमको मिला है  देखना चाहते हैं  तो इसके लिए आप अपनी श्रद्धा को विकसित कीजिए। चरित्र के बारे में ध्यान रखिए। दोष-दुर्गुणों का त्याग कीजिए और सेवावृत्ति के लिए उदारता से तैयार हो जाइए और यह देखिए कि जनमानस के परिष्कार के लिए आप क्या कर सकते हैं। समय का ( समयदान) , श्रम( श्रमदान ) का, धन ( अंशदान ) का, अपनी बुद्धि का कोई हिस्सा लगाने के लिए आप तैयार हैं क्या ? कोशिश कीजिए, हिम्मत कीजिए। बीज के तरीके से गलिए और वृक्ष के तरीके से फलिए।

हमने तीन शर्तों पर अपने गुरु से सारी-की-सारी दौलत, सारे-के-सारे धन पाए हैं।  पी० एम०टी० की मेडीकल परीक्षा की तरह यह तीन पर्चे हैं कि उदारता की दृष्टि से कितने पैने साबित होते हैं आप। चरित्र की दृष्टि से कितने पवित्र साबित होते हैं। जितने आप नंबर लाते जाएँगे उतने परीक्षा में पास होते जाएँगे। उसी हिसाब से उसी अनुपात से उसी मात्रा में आपके लिए सफलताएँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, अनुदान-वरदान सुरक्षित रखे हुए हैं। टिकट लीजिए ‘गिव एंड टेक’, दीजिए और लीजिए। मेरे जीवन के सारे के सारे निष्कर्ष और निचोड़ यही हैं। मैं चाहता हूँ इनसे आप भी लाभ उठाएँ और गायत्री मंत्र की महिमा और गरिमा को बढ़ाएँ। उपासना के बारे में ऋषियों ने, शास्त्रों ने जो कुछ कहा है, वह साबित करके दिखाएँ। हमने यही साबित करके दिखाने की कोशिश की और आपसे भी यही अपेक्षा करेंगे कि आप जब यहाँ से विदा हों तो वैसा ही साहस, हिम्मत और दृष्टिकोण लेकर जाएँ, जिससे वे तीनों आधार जो गायत्री मंत्र को, त्रिपदा को सफल और सार्थक बनाने में समर्थ रहे हैं, वही आपके जीवन में भी आएँ और आप वे लाभ उठाएँ जो प्राचीनकाल के उपासकों ने उठाया था और हमने भी। आज की बात समाप्त। ॐ शांति।

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