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शांतिकुंज में यज्ञशाला के सामने अंकित हैं यह अंतिम सन्देश

23  फरवरी  2021 का ज्ञान प्रसाद 

परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण पर आधारित हमारा 21 फरवरी वाला लेख आप सभी ने बहुत ही पसंद किया ,सराहा। बहुत से परिजनों के हृदयविदारक कमेंट भी पढ़े  और अपने विवेक के अनुसार जहाँ तक हो सका  उत्तर भी दिए।   इसके लिए सभी का ह्रदय से धन्यवाद्।  उसी लेख में आज हम परमपूज्य गुरुदेव और  परमवंदनीय माता जी के अंतिम सन्देश आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।  यह अंतिम सन्देश शांतिकुंज के पवित्र क्षेत्र में यज्ञशाला के दोनों तरफ metal  boards  पर अंकित हैं।  जो परिजन सौभाग्यवश  शांतिकुंज में प्रवास कर चुके हैं उन्होंने यह अंतिम सन्देश अवश्य ही देखे होंगें ,पढ़े होंगें और इन  शब्दों पर मनन चिंतन तो अवश्य ही किया होगा।  आज के लेख में हम उन boards  के चित्र तो दे ही रहे हैं साथ में उन पर क्या लिखा है उसको भी प्रस्तुत कर रहे हैं।  यह हम इसलिए कर रहे हैं कि  चित्रों को zoom  करने की कोई सीमा होती है और फिर उनमें blurring ( धुंधलापन ) भी आ जाती है।  यह चित्र हमने अपने कैमरे  में अपने प्रवास के दौरान कैद किये थे।  आशा करते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मी इन अंतिम संदेशों को ध्यान से पढ़  कर मनन करेंगें और  गायत्री परिवार ,उस युगपुरष और युगशक्ति के संरक्षण में अपने आप को  गौरवशाली मानेगें। 

परमपूज्य गुरुदेव एवं परम् वंदनीय माता  जी के श्री चरणों में समर्पित 


अंतिम  सन्दे श 

अस्सी वर्ष जी गयी लम्बी सोद्देश्य शरीर यात्रा पूरी हुई। इस अवधि में परमात्मा को हर पल अपने हृदय और अन्तःकरण में प्रतिष्ठित मानकर एक-एक क्षण का पूरा उपयोग किया है। शरीर अब विद्रोह कर रहा है, यूँ उसे कुछ दिन और घसीटा भी जा सकता है, पर जो कार्य परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता ने सौंपे हैं, वे सूक्ष्म और कारण शरीर से ही सम्पन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में कृशकाय शरीर से मोह का कोई औचित्य नहीं है। “ज्योति बुझ गई”, यह भी नहीं समझा जाना चाहिये। अब तक के जीवन में जितना कार्य इस स्थूल शरीर ने किया है, उससे सौ गुना सूक्ष्म अन्तःकरण से सम्भव हुआ है। आगे का लक्ष्य विराट् है । संसार भर के छः अरब मनुष्यों की अन्तश्चेतना को प्रभावित और प्रेरित करने, उनमें आध्यात्मिक प्रकाश और ब्रह्मवर्चस जगाने का कार्य पराशक्ति से ही सम्भव है। परिजन, जिन्हें हमने ममत्व के सूत्र से बाँधकर परिवार के रूप में विस्तृत रूप दे दिया है, सम्भवतः स्थूल नेत्रों से हमारी काया को नहीं देख पायेंगे, पर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि इस शताब्दी के अन्त तक, जब तक सूक्ष्म शरीर कारण के स्तर तक न पहुँच जाय, हम शान्तिकुञ्ज परिसर एवं प्रत्येक परिजन के अन्तःकरण में विद्यमान रहकर अपने बालकों में नवजीवन और उत्साह भरते रहेंगे। उनकी समस्या का समाधान उसी प्रकार निकलता रहेगा, जैसा कि हमारी उपस्थिति में उन्हें उपलब्ध होता है। हमारे आपसी सम्बन्ध अब और भी प्रगाढ़ हो जायेंगे  क्योंकि हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े थे। हमें एक क्षण के लिए भुला पाना आत्मीय परिजनों के लिए कठिन हो जायेगा। ब्रह्मकमल के रूप में हम तो खिल चुके किन्तु उसकी शोभा और सुगन्धि के विस्तार हेतु ऐसे अगणित ब्रह्मबीज-देवमानव उत्पन्न कर जा रहे हैं, जो खिलकर समूचे संस्कृति-सरोवर को सौन्दर्य-सुवास से भर सकें, मानवता को निहाल कर सके। ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं का उत्पादन, प्रशिक्षण एवं युग निर्माण के महान कार्यो में। उनका नियोजन बडा कार्य है। यह कार्य हमारे उत्तराधिकारियों को करना है। शक्ति हमारी काम करेगी तथा प्रचण्ड शक्ति प्रवाह अगणित देवात्माओं   को इस मिशन से अगले दिनों जोड़ेगा , संरक्षण, स्नेह देने, खरादने-सँवारने का कार्य माताजी सम्पन्न करेंगी। हम सतयुग की वापसी के संरजाम में जुट जायेंगे। जो भी संकल्पनायें नवयुग के सम्बन्ध में हमने की थीं वह सम्पन्न होकर रहेंगी। इसी निमित्त काय पिंजर का सीमित परिसर छोड़कर हम विराट् घनीभूत प्राण ऊर्जा के रूप में विस्तृत होने जा रहे हैं। देव समुदाय के सभी परिजनों को मेरे कोटि-कोटि आशीर्वाद  प्रगति की दिशा में अग्रसर होने हेतु अगणित शुभकामनाएँ।

श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अंतिम सन्देश 

जिन चरणों में अपने आप को समर्पित किया, उनके बिना जीवन का एक-एक क्षण पीड़ा के पहाड़ की तरह बीत रहा है। जिस दिन उनके पास आई, उस दिन का पहला पाठ था- पीड़ित मानवता की सेवा और देवसंस्कृति का पुनरभ्युदय, सो अपने आप को उसी में घुला दिया। यद्यपि यह एक असह्य वेदना थी, तथापि महाप्रयाण से पूर्व परम पूज्य गुरुदेव की आज्ञा थी कि अपने उन बालकों की अंगुली पकड़कर उन्हें मिशन की सेवा के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ा दूं जिन्हें अगले दिनों उत्तरदायित्व सम्भालने हैं। पिछले चार वर्षों में मिशन जिस तरह आगे बढ़ा, वह सबके सम्मुख है, जो मैं देख रही हूँ।  

आगे का भविष्य तो इतना उज्ज्वल है, जिसे कल्पनातीत और चमत्कार कहा जा सकता है। उसके लिए जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता है, हमारे बालक अब उसमें पूर्णतया प्रशिक्षित हो गए हैं।

शरीर यात्रा अब कठिन हो रही है। उनके जाने के पश्चात् से आज तक एक क्षण भी ऐसा नहीं बीता, जब वे आँखों से ओझल हुए हों। घनीभूत  पीडा अब आँसु रोक नहीं पा रही, सो मुझे अब विराट् तक पहुँचना अनिवार्य हो गया है। यह न समझें कि हम स्वजनों से दूर हो जायेंगे। परमपज्य गरुदेव के सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में विलीन होकर हम अपने आत्मीय कुटुम्बियों को अधिक प्यार बाँटेंगे, उनकी सुख-सुविधाओं में अधिक सहायक होंगे।

हमारा कार्य अब सारथी का होगा। दुष्प्रवृत्तियों से महाभारत का मोर्चा अब पूरी तरह हमारे कर्त्तव्यनिष्ठ बालक सम्भालेंगे। सभी क्रियाकलाप न केवल पूर्ववत सम्पन्न होंगे. वरन विश्व  के छ: अरब लोगों के चिन्तन, जीवन, व्यवहार, दृष्टिकोण में परिवर्तन और मानवीय संवेदना की रक्षा के लिए और अधिक तत्पर होकर कार्य करेंगे। हम तब तक रुकें नहीं, जब तक धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अभ्युदय स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने लगे।

भगवती देवी शर्मा

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