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गुरुदेव के ऊपर 1985 का जानलेवा हमला

19  फ़रवरी 2021  का ज्ञानप्रसाद 

ऑनलाइन ज्ञानरथ के परिजनों को हमारा अभिनंदन आभार : 

 गुरुदेव के ऊपर 1985  का  जानलेवा हमला

पूज्य गुरुदेव का शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं, जीवन शक्ति तो प्रचंड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के 24 वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और  भी कृश हो गया था, पर जब बोने-काटने की विधा अपनाई तप शक्ति अर्जित की  तो पिचहत्तर वर्ष की  उम्र में  भी वह इतना सुदृढ़ था  कि गुरुदेव ने एक बार  एक बिगड़ैल साँड़ को कंधे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और वह  भागते ही बना। यह 1986  की बात है शायद । 

गुरुदेव लिखते हैं :

यह  सर्वविदित है कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर किराए के हत्यारे ने एक वर्ष  पूर्व  (1985 ) पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किए और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गईं।  भय के मारे रिवाल्वर  वहीं गिर गई। अब की बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते रहे। खून बहता रहा, पर भोंके गए सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गए। डाक्टरों ने जख्म सी दिए और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों का त्यों हो गया। इसे परीक्षा का एक घटनाक्रम ही कहना चाहिए कि पाँच बोर का लोडेड रिवाल्वर शातिर हाथों में भी काम न कर सका। जानवर काटने के छुरे के बारह प्रहार मात्र प्रमाण के निशान छोड़कर अच्छे हो गए। आक्रमणकारी अपने बम से स्वयं घायल होकर जेल जा बैठा। जिसके आदेश से उसने यह किया था, उसे फाँसी की सजा घोषित हुई। असुरता के आक्रमण असफल हुए। एक उच्चस्तरीय दैवी प्रयास को निष्फल कर देना सम्भव न हो सका। 

” मारने वाले से बचाने वाला बड़ा सिद्ध  हुआ “

यह सब कैसे संभव हो सका : सिख धर्म के महान ग्रन्थ ,  “श्री गुरु ग्रन्थ साहिब ” में बहुत ही प्रसिद्ध शबद  है : 

  ” जिस के सिर ऊपर तू  स्वामी सो दुःख कैसा पावे “ 

गुरुदेव के पीछे मार्गसत्ता का हाथ था । गुरुदेव की निष्ठां ,समर्पण और तप शक्ति ने असम्भव को सम्भव कई  बार प्रतक्ष्य कर दिखाया । गुरुदेव के मन में नया युग रचने की अभिलाषा थी । नव सृजन ( new  creation ) के लिए जिन साधनों की आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिले, कहाँ से आएँ ?  छोटे से छोटे  देश की कोई भी योजना  में ज़रा सा परिवर्तन लाना हो तो कई तरह के कानून बनाने पड़ते हैं , पार्लियामेंट  में पास करवाना होता है , राष्ट्रपति के हस्ताक्षतर होने होते हैं तब जाकर कुछ बन पड़ता है । गुरुदेव ने तो सारे विश्व को परिवर्तित करने का शंख नाद किया था ।  कैसे होगा यह सब कुछ , इतनी बड़ी योजना -युग निर्माण योजना – ।  

इस प्रश्न के उत्तर में गुरुदेव लिखते हैं 

“ मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि -बोओ ओर काटो।  मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन् उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने  भगवान की ऊँगली पर अपनी साड़ी के टुकड़े से पट्टी बाँधी  थी और  वही आड़े समय (द्रौपदी चीरहरण )  में इतनी बनी कि उन साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान् को स्वयं भाग कर आना पड़ा। ‘जो तुझे पाना है, उसे बोना आरम्भ कर दे।’’ 

यही बीज मंत्र हमें बताया और हमने अपनाया ।  प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया। शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान् सबको देते हैं। धन स्व उपार्जित होता है। कोई हाथों-हाथ कमाता है, तो कोई पूर्व संचित सम्पदा को उत्तराधिकार ( herediatry  property ) में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था, पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुंजायश थी, सो बिना समय गँवाए उस प्रयोजन में अपने को और पैतृक सम्पति को  लगा दिया। अपनी जन्मस्थली आंवलखेड़ा में अपनी माता जी के नाम पर श्री  दान कुंवरि इंटर कॉलेज और कई अनगनित संस्थान इसी निर्देश का ही परिणाम है ।  माताजी के नाम पर आंवलखेड़ा स्थित कॉलेज पर हमारे द्वारा बनाई गयी वीडियो का लिंक प्रस्तुत है।  https://youtu.be/ijXXc0t-clg रात में भगवान् का भजन कर लेना और दिन भर विराट् ब्रह्म के लिए, विश्व मानव के लिए समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया। समस्त बुद्धि  केवल दिन भर जागने में ही नहीं परन्तु  रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिए सुविधा सम्पदा कमाने का ताना-बाना बुनने की कभी भी इच्छा ही नहीं हुई। अपनी भावनाएँ सदा विराट के लिए लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं आदर्शों से किया। गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत उमड़ती रहीं। इस विराट् को ही हमने अपना भगवान् माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ( divine  eyes ) ने इसी विराट् के दर्शन किए थे। माता यशोदा ने  भगवान कृष्ण के मुख में स्रष्टा ( creator , almighty  GOD ) का यही स्वरूप देखा था।  भगवान राम ने पालने में पड़े-पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काकभुशुण्डि  ( an important character of Ramcharitmanas)इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुए थे। हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट ब्रह्म को-विश्व मानव को सौंप दिया। बोने के लिए इससे उर्वर ( fertile ) खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला-फूला। हमारे कोठे भर दिए, सौंपे गए कामों के लिए जितने साधनों की जरूरत थी, उसी में जुट गए। हमने 75  वर्षों में विभिन्न स्तर के इतने काम किए हैं कि उनका लेखा-जोखा लेने पर वे 750  वर्ष से कम में होने वाले सम्भव प्रतीत नहीं होते। यह सारा समय नवसृजन की एक से एक अधिक सफल भूमिकाएँ बनाने में लगा है। निष्क्रिय-निष्प्रयोजन और खाली कभी नहीं रहा है। बुद्धि को भगवान् के खेत में बोया और वह असाधारण प्रतिभा बनकर प्रकटी। अभी तक लिखा हुआ साहित्य इतना है कि जिसे शरीर के वजन से तोला जा सके। यह सभी उच्च कोटि का है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा युग की भावी पृष्ठभूमि बनाने वाला ही सब कुछ लिखा गया है। आगे का सन् 2000 तक का हमने अभी से लिखकर रख दिया है।

 ” सर्वस्व समर्पण   करना पड़ता है , उस परब्रह्म की शक्ति पाने के लिए ” 

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गुरुदेव ने अपने साहित्य को , ऑडियो कैसेटस  को, वीडियो लिंक्स को किसी प्रकार के copyright  restrictions  से स्वतंत्र रखा है । परिजन उनके साहित्य में से अध्यन करके जनसाधारण के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं , जैसे हम कर रहे हैं , तो हो सकता है कि कहीं तिथियों में कोई doubt हो लेकिन तथ्य की truthfulness का पूरा ख्याल रखा गया है ।  फिर ही अगर हमारे आदरणीय परिजन  कहीं किसी त्रुटि देखें तो हमे  तुरंत  अवगत करें ,आखिर यह ज्ञानरथ हम सबका है हम सबका पुरषार्थ  है 

जय गुरुदेव

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी के श्री चरणों में समर्पित 

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