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पूज्यवर का गायत्री नगर बसाने का संकल्प

गायत्री नगर बनाने का संकल्प इसी द्वष्टि से उठा कि धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न छोटे रुप में साकार करके दिखाया जाय। भावी सम्भावनाओं का अनुमान लगाने के लिए वर्तमान में भी कुछ प्रतीक चिन्ह तो खड़े करने ही पड़ते हैं। इमारते बनने से पूर्व उनके नक्शें बनते है। मूर्तियाँ गढ़ी जाने से पूर्व उनके माँडल खड़े होते हैं। देवताओं का स्वर्ग पहले इसी अपनी भारत भूमि पर बिखरी हुई स्वर्णिम परिसिथतियों में प्रतिभाषित होता था। दसे देखकर लोग उससे भी ऊँची परिस्थितियों का अनुमान लगाते थे और मरणोतर जीवन आने पर वही पहुँचने का स्वप्न देखते थे।

घर परिवारों को स्वर्ग का छोटा प्रतीक प्रतिनिधि माना जाता था। उनमें भावनात्मक व्यंजन मिलते है। छोटे-बड़े, नर-नारी, विकसित – अविकसित सब मिल-जुलकर एक गुलदस्ता बनते थे और संयुक्त अस्तित्व आनन्द के झूले झूलते थे। दीवार, छप्पर तो इन्ही दिनों जैसे होते थे। चूल्हा चक्की, बुहारी-चारपाई तो इन दिनों जैसे ही होते थे, पर उनमें व्यवस्था और सुसज्जा की ऐसी कलाकारिता समाई होती थी कि इसआश्रम रुपी घरमें में पलने वाले स्वर्ग का पूर्णभास पाते और मोद मनाते थे। जहाँ श्रमशीलता और व्यवस्था रहेगी वहाँ दरिद्रता क्यों प्रवेश करेंगी ? जहाँ आपाधपी नहीं, वहाँ मनोमालिन्य किस बात का ? जहाँ दुष्टता नहीं वहाँ विग्रह ( बटवारा ) क्यों ? जिन कारणों से नरक पनपता है उनकी जड़ ही ना जमने पाए तो असन्तोष कैसा ? भारतीय परिवारों में आतिथ्य पाने वाले विदेशी तक अपने भाग्य को सराहते हैं । वहाँ क्या खाया-पीया वह तो छोटी बात है, क्या देखा और क्या अनुभव किया, इसी की स्मृति उनके मानस पटल पर आजीवन छाई रहती । ऐसे हैं भारतीय परिवार। उन्ही का संयुक्त रुप अपने देश की धरती पर बिखरा पड़ा था। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में भी अब nuclear families प्रचलन हो गया है लेकिन संयुक्त परिवार जिसमें तीन पीढियां बड़े ही स्नेह और सम्मान के साथ एक साथ रह रही हैं वोह भी कम नहीं हैं

नव-निर्माण मिशन ने अपने लक्ष्य को दो स्वरुप में चरितार्थ होने की सम्भावना घोषित की है।
1. घरती पर स्वर्ग का अवतरण 2. मनुष्य के देवत्व का उदय।

यह दो आधार दो पृथक इकाइयाँ नहीं वरन् एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ लोगो की मनःस्थिति में देवत्व की उत्कृष्टता भरी होगी वहाँ व्यवहार में स्नेह, सहयोग, सृजन, की हलचलें द्वष्टिगोचर होंगीं । दूसरे शब्दों में इसी प्रकार कहा जा सकता है कि जहाँ स्वर्गीय वातावरण होगा वहाँ इस प्रभाव से प्रभावित व्यक्ति देवत्व का आचरण करते, देवों जैसा द्वष्टिकोण अपनाते पाये जायेगे। देवताओं की निवास भूमि को स्वर्ग कहते है। जितना यह कथन सत्य है उतना ही यह भी तथ्य है कि स्वर्गीय वातावरण में रहने वाले देवत्व से ही भरते चले जायेंगें।

यह कथन किस हद तक सही है ? सामान्यता इसे हर व्यक्ति जानना चाहेगा ? जो व्यवहार में द्वष्टिगोचर होता है जिज्ञासा उसी की होती है। जादू उस प्रस्तुतीकरण को कहते है जो सामान्यतः देखा नहीं जाता। सिद्वियाँ उन विशेषताओं को कहते है, जो हर किसी में द्वष्टिगोचर नहीं होतीं। देवेता अलौकिक होते है। स्वर्ग धरती से बहुत ऊपर है। इन समस्त प्रति पादनों से एक ही ध्वनि निकलती है कि जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए युग निर्माण मिशन के प्रयास चल रहे हैं वे सामान्य जन-जीवन से बहुत ही ऊँची स्थिति है। इस वातावरण और प्रतिपादन की जीता जागता उदाहरण ही है गायत्री नगर। हम कई बार कह चुके हैं कि एक बार जब आप इस युग तीर्थ के पांचों में से किसी भी एक द्वार से प्रवेश कर जाते हैं तो आपको साक्षात् ऋषि परम्परा का आभास हो जाता है।

धरातल पर सहगमन एक जैसा होता है। मनुष्य दो पैरों से और पशु चार पैरों से चलते है, पर पक्षी आकाश में उड़ते हैं। केवल चलने और उड़ने का ही अन्तर मात्र है। इसी प्रकार लोक व्यवहार और आर्दशवादी अनुशासन में भी भिन्नता है ।

“आस्थाओं और चेष्टओं में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ जाने को ही अध्यात्म की भाषा में उत्कर्ष या अभ्युदय कहते है।”

सम्पदाओ को वैभव कहते है। वैभव कोई भी रख सकता है, चोर- लुच्चा भी। वह उत्तराधिकार, लाटरी में या भाग्यवश अनायास भी मिल सकता है। किन्तु अभ्युदय तो हर व्यक्ति का निजी उपार्जन है। रोटी स्वयं खाई व स्वयं पचाई जाती है, काया को जीवन शक्ति उसी से प्राप्त होती है। दूसरों के खाने पचाने से अपने शरीर में रक्त माँस नहीं बढ़ता। इसी प्रकार देवत्व और अभ्युदय के लिए वैयक्तिक प्रयास से परिशोधन और अभिवर्धन का क्रम चलता है। इसी राजमार्ग पर एक-एक कदम चलते हुए जीवन लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव होता है। “यही है देवत्व की उपलब्धि का स्वरुप।” उसे प्राप्त करने में यों तो मार्गदर्शन भी आवश्यक होता है, वस्तुतः काम वातावरण से बनता है।

ऐसी व्यवस्था जहाँ बनी, समझना चहिए कि संभावनाओं के प्रत्यक्ष होने का साधन बन गया। इसीलिए गुरुदेव ने युगतीर्थ शांतिकुंज में ऐसी आत्माओं को आमंत्रण भेजा था। अखंड ज्योति के अप्रैल 1980 के अंक में लगभग 20 पन्नों का पूरा लेख है जिसमें विस्तार पूर्वक वर्णन है कि इन महान आत्माओं को किस आधार पर यहाँ आने का और जीवन दान देने का आमंत्रण भेजा था। ऐसे ही नहीं बिना सोचे समझे , किसी लोभ में आकर , इतनी बड़ी -बड़ी पदवियाँ अपना घर बाहर छोड़ कर यहाँ आ गए थे। आज भी कितने ही महापुरष गायत्री नगर में आजीवन प्रवास से जीवनदान कर रहे हैं।

नव युग में चिन्तन किस स्तर का होगा, उसकी झाँकी करने और उसे लोकमानस में जमाने के लिए अखण्ड-ज्योति ने लम्बे समय से प्रयास किया है। प्रतिपादनों के पीछे जुड़े हुए तथ्य और सत्य ने हर विचारवान् को प्रभावित और प्रेरित किया है। चिन्तन का प्रवाह मोड़ने में उस प्रयास को उत्साहवर्धक ही नहीं आशातीत कही जाने वाली सफलता भी मिली है। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रतिफल दृष्टिगोचर नहीं हो सका। चिन्तन चरित्र में नहीं उतरा और देव चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ।

“इस कमी का एक ही करण है। बीजोरोपण के उपरान्त उपयुक्त खाद पानी का न मिलना।”

आर्दशवादी प्रतिपादनों को बीजारोपण से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। महत्व तो है पर समग्र नहीं। स्वाध्याय और सत्संग का महत्व एकपक्षीय है। बात आचरण से बनती है और उसके लिए अनिवार्य रुप से वातावरण चाहिए। उद्यान लगाने वाले सिंचाई, रखवाली, माली आदि की समस्त व्यवस्थाए बनाते है अन्यथा आपने आप तो जंगलों में झाड़-झंखाड़ ही उगते बढ़ते है। अनगढ़ता सर्वत्र है। सुसंस्कारिता के लिए तो नियोजन और अनुशासन को निरन्तर अपनाये रखना पड़ता है। उद्यान लगाना एक बात है लेकिन परिवार बसाना दूसरी। गुरुदेव ने गायत्री नगर की भूमि का चयन तो कर लिया परन्तु यहाँ के वातावरण का आभास करने के लिए तो यहाँ आकर कुछ समय व्यतीत करना ही पड़ेगा। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए शॉर्टकट तो बहुत हैं लेकिन सही मानों में शिक्षा और ज्ञान तो केवल स्कूल / कॉलेज /यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर ही मिलता है।

केवल ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष बनाये रखने से ही काम नहीं चलता । इस मधुर कल्पना को कब तक रखे रखा जायगा ? एकता और ममता के ईंट-गारे से ही नव युग का भवन चुना जाता है । इसलिए पूज्यवर ने सोचा था उसको प्रत्यक्ष करना अति आवश्यक है। योजनाएँ भी दिवा स्वप्न ही होती हैं। उनमें उन्तर इतना ही रहता है कि उपलब्धि के लिए साधन जुटाने की सम्भावनाओं को जोड़ कर रखते हैं जबकि स्वपनों में वैसा कुछ नहीं होता। वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वप्न चिरकाल से देखे जाते रहे हैं और उनकी पूर्ति में उज्ज्वल भविष्य का रगींन चित्र दर्शाया जाता रहा है । अब एक कदम आगे बढ़ने की आवश्यकता है। रात्रि स्वप्नों और दिवा स्वप्नों में जो अन्तर होता है वेसे समझा जाना चाहिए। रात्रि स्वप्न कल्पना क्षेत्र में अविज्ञात से आते और अनन्त की ओर उड़ते चले जाते है। उनके सिर पैर नहीं होते। किन्तु दिवा स्वप्नों के पीछे कार्य करण की संगति होती है। उनके पीछे क्रमबद्ध योजना बनती और साधन जुटाने की तत्परता रहती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की आदर्शवादिता को अब स्वप्न लोक से नीचे लगने और व्यवहार में उतारने का समय आ गया है।

जैसा हम पहले भी वर्णन कर चुके हैं यह योजनाएं लगभग 40 वर्ष पूर्व उद्घाटित की गयी थीं। आज के शांतिकुंज /गायत्री नगर का स्वरूप गुरुदेव की आशाओं पर शत प्रतिशत उतरा है ,हो भी क्यों न , गुरुदेव सूक्ष्म रूप में मार्गदर्शन जो दे रहे हैं।

इति श्री

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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