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1973 के प्राण प्रत्यावर्तन सत्र

2 दिसंबर 2020 का ज्ञान प्रसाद : सुप्रभात ,शुभ दिन की कामना

आज का लेख हमने अखंड ज्योति के अगस्त 1990 पर आधारित किया है। यह अंक ब्रह्मवर्चस के कार्यकर्ताओं ने स्मृति विशेषांक के रूप में प्रस्तुत किया था। गुरुदेव के बारे में इस अंक में पढ़ते हुए जिज्ञासा हुई कि ” प्राण प्रत्यावर्तन ” क्या है। गूगल सर्च से इस टॉपिक पर 20 पन्नों का आर्टिकल ” चेतना की शिखर यात्रा 3 ” में से मिला। कई दिन बार -बार लगातार इस टॉपिक पर स्वाध्याय करते हुए लग रहा था कि इसको आपके समक्ष सरल भाषा में केवल 3 -4 पन्नों में प्रस्तुत करना बहुत ही कठिन है ,लेकिन गुरुदेव के मार्गदर्शन ने एक बहुत ही उपयोगी लेख लिखवाया है। ओरिजिनल लेख में तो कई साधकों की अनुभूतियाँ हैं लेकिन हमने केवल एक की ही (स्वयं प्रकाश ) विस्तार से प्रस्तुत की है। तो आइये देखें प्राण -प्रत्यावर्तन की क्रिया

क्या होता है प्राण प्रत्यावर्तन ?

प्रत्यावर्तन का शाब्दिक अर्थ होता है संपदा, जायदाद आदि की वापसी। गुरुदेव ने अपनी हिमालय यात्रा से वापिस आते ही 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों की घोषणा कर दी थी।

इस उदाहरण से हम देख सकते हैं कि प्राण प्रत्यावर्तन से कैसा आभास होता है

चारो ओर नील अगाध जलराशि लहरा रही है। उस जलराशि में एक कोमल कमल-पत्र तैर रहा है। उस पत्ते पर सांवले सलोने रंग के बालमुकुंद हैं, उनके पांवों में पैंजनिया बंधी हुई हैं। शिशु भगवान दाएं पांव का एक अंगूठा मुंह में लेकर चूस रहे हैं जैसे उसमें रस का प्रवाह आ रहा हो। उस दृश्य को देखते देखते साधक अवधेश प्रसाद की अपनी चेतना लुप्त होने लगी। प्रतीत होने लगा कि भीतर से कोई ज्योति निकली और कमलपत्र पर लेटे बालमुकुंद के कलेवर में जा समाई। फिर धीरे धीरे चित्त हलका होने लगा। इतना हलका हो गया कि अपना आपा ही जैसे गिर गया। अवधेश को प्रतीत होने लगा कि वह स्वयं बालमुकुंद हो गया है। या शिशु भगवान ही उसके अपने रूप में व्यक्त हो रहे हैं, लीला कर रहे हैं।

पांच दिन के सत्र का प्रथम दिन : एक साधक की दिनचर्या

प्राण प्रत्यावर्तन साधना का यह पहला दिन था। समय रहा होगा सुबह सवा पांच और साढ़े पांच के बीच का । सुबह चार बजे ही नींद खुल गई थी। घर पर सामान्य जीवन में सुबह छह-सात बजे से पहले बिस्तर छोड़ने का मन नहीं होता। यहां बिना जगाए ही नींद टूट गई। सुविधा के लिए सामने मेज पर अलार्म घड़ी रखी थी लेकिन उसकी जरूरत नहीं हुई। उठते ही स्नानादि से निवृत्त हुआ गया। शांतिकुञ्ज के मुख्य भवन में ही इस साधना की व्यवस्था कर दी गई थी। आरंभ में बने आठ कमरों के बीच दीवारें खिंचवा कर चौबीस कक्ष बना दिए गए थे। चौबीस कक्षों में ही एक कक्ष में अवधेश प्रताप भी ठहरे थे। बाकी अन्य कक्षों में तेईस साधक थे। इन चौबीस साधकों को पांच दिन की अवधि में बाहर निकलने की मनाही थी। स्नान आदि के बाद दीपदर्शन, ऊष:पान और दर्शन-प्रणाम के अलावा पूरे समय साधना कक्ष में ही रहना था। आश्रम परिसर से बाहर तो दूर, कक्ष के बाहर निकलने या आपस में बातचीत करने पर भी प्रतिबंध था।

गुरुदेव ने प्राण प्रत्यावर्तन साधना क्यों करवाई :

प्राण प्रत्यावर्तन साधना सत्रों की रूपरेखा निजी प्रयासों से ज्यादा अनुदान और दैवी अनुग्रह को ग्रहण करने की दृष्टि से निर्धारित की गई थी। पूर्वी अफ्रीका प्रवास से लौटते ही गुरुदेव ने घोषित किया था कि इन सत्रों में भाग लेने वाले साधक अपने आपको ऊर्जा से भरा पाएंगे। दिव्य अनुदानों की वर्षा अनवरत होती रहती है। उसे ग्रहण करने के लिए पात्रता चाहिए। इस पात्रता के लिए साधना का अनुशासन पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए। प्राण प्रत्यावर्तन साधना में उसी अनुशासन का अभ्यास होगा।

पांच दिन के सत्र में पहला ध्यान अपने आपको बाल भगवान के रूप में अनुभव करना था। उस अनुभूति से गुजरते हुए कई साधकों ने अनुभव किया कि बाद की ध्यान धारणा में वे अपने चित्र को पहले से ज्यादा निर्मल और शुचितापूर्ण बना कर गए थे। गंदगी से सने शिशु को दूर ही रखते हुए मां जैसे धो- पोंछकर, नहा- धोकर साफ करती है और फिर गोद में उठाती है, वैसी अनुभूति साधकों को हुई। भाव प्रवण साधकों ने ध्यान करने के बाद अपने आपको कमलपत्र से उठकर गायत्री माता की गोदी में भी हंसते खेलते हुए अनुभव किया। प्रतीति हुई कि मां उन्हें स्नेह से दुलार रही है, लाड़-लड़ा रही है।

खेचरी मुद्रा का अभ्यास :

इस ध्यान के बाद खेचरी मुद्रा का अभ्यास । जिह्वा को उलटकर तालू से लगाने और ब्रह्मरंध्र से अमृत की बूंदे टपकने का अनुभव। यह अनुभूति भाव जगत में ही होती थी। इसके साथ दिव्य लोकों से उच्चस्तरीय अनुदान बरसने की कल्पना भी की जाती। भाव और कामना को कुछ साधकों ने सपने की तरह भी देखा। जागते हुए देखा गया सपना। ( Day dreaming)

शिविर में आए साधकों को प्रतिदिन गुरुदेव से भेंट के लिए अलग समय मिलता था। उस समय साधक अकेला ही होता। गुरुदेव से साधना उपासना के बारे में चर्चा की खुली छूट थी। वे अपनी व्यक्तिगत बातें भी कह लेते। उनकी लौकिक और आत्मिक समस्याओं को गुरुदेव बराबर महत्त्व देते हुए सुनते थे।

सुबह चार बजे से आरंभ हुई दिनचर्या में केवल एक ही बार अपने कक्ष से बाहर निकलना होता था। स्नान ध्यान के बाद माताजी के सान्निध्य में उष:पान के लिए जाने के अलावा साधना कक्ष में ही पूरा समय व्यतीत करना होता था। उष:पान में साधक को डेढ़ लीटर जल ग्रहण करना होता है ( गूगल सर्च ) उस एक घड़ी में साधकों को अपनी कोई समस्या, व्यथा या कठिनाई बताना होती तो वे माताजी से कह देते थे। यों परिजनों का अनुभव था कि कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी। पल प्रतिपल लगता था कि गुरुदेव और माताजी का स्नेह दुलार मिल रहा है। प्रत्यक्ष की भांति वह सहज सुलभ है। ध्यान में, जप में, प्राणायाम के समय सोऽहम साधना में और नादयोग के समय उनके मार्गदर्शक उन्हें निरख परख रहे हैं। इस अनुभूति के बावजूद परिजनों को गुरुदेव से प्रत्यक्ष भेंट के लिए अपनी बारी का इंतजार रहता। पांच दिन के सत्र में वह अवसर एक बार ही आता था।

गुरुदेव के प्रवचन इन दिनों नहीं होते थे। साधना संबंधी निर्देश साधना कक्ष में रहते हुए ही मिल जाते थे। गुरुदेव की वाणी उस समय प्रत्यक्ष सुनाई देती थी। फिर भी उनके प्रत्यक्ष दर्शन और सान्निध्य की लालसा तो रहती ही थी। यह अवसर जब भी मिलता साधक की भाव भूमिका कुछ अलग और विशिष्ट स्तर की हो जाती।

स्वयं प्रकाश जी की अनुभूति : पाठकों से निवेदन है इस अनुभूति को अवश्य पढ़ें

कर्नाटक से आए एक साधक स्वयं प्रकाश जी ( नाम बदला हुआ है ) को लग रहा था कि अपने सौभाग्य का सूर्यौदय होने जा रहा था। अनुभव इसलिए भी था कि स्वयं प्रकाश मथुरा के विदाई सत्त्मेलन के बाद ही गुरुदेव की साधना परंपरा में आए थे। जून 1971 के बाद उन्होंने एक क्षेत्रीय कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। वहीं से गुरुदेव के विचार संपर्क में आए। स्वाध्याय करते हुए लगा कि अपना इष्ट, उपास्य ही सामने बैठ कर शिक्षण कर रहा है। पिता की तरह दुनियादारी सिखा रहा है, मां की तरह लाड़ दुलार कर रहा है। नवंबर 1971 में हैदराबाद के पास गुलबर्गा में एक महायज्ञ हुआ। स्वयं प्रकाश ने तब तक गुरुदेव से अपने तार इतने जोड़ लिए थे कि उसे विधिवत संस्कार का रूप देने का निश्चय कर लिया। महायज्ञ में आए क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के संयोजन संचालन में उन्होंने गुरुदीक्षा ले ली। डेढ दो महीने बाद ही लगा कि गुरुदेव से प्रत्यक्ष भेंट हो सकती है। यह आशा अपेक्षा ही थी। पता नहीं कब प्रतीती में बदल गई और अपेक्षा अब निश्चित संभावना लगने लगी। तब तक गुरुदेव हिमालय से वापस नहीं आए थे। स्वयं प्रकाश का अंत:करण इस विश्वास से भरता जा रहा था कि उनके दर्शन होंगे और सान्निध्य भी मिलेगा।

इस प्रसंग में साधक का नाम बदल दिया गया है क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनकी अनुभूति को उनके नाम से ही सार्वजनिक किया जाए। इसलिए साधक का नाम स्वयं प्रकाश लिखना पड़ा है। उन्होंने बताया कि गुलबर्गा में दीक्षा लेते समय उन्हें गुरुदेव के सान्निध्य की कई बार अनुभूति हुई। वे यज्ञशाला में सूक्ष्म रूप से दिखाई दिए। उनकी उपस्थिति कभी-कभी आकार भी ले लेती। गुरुदेव को स्वयंप्रकाश ने कभी प्रत्यक्ष नहीं देखा था, इसलिए पहचान नहीं पाए। उस आकृति के दो बार दर्शन हुए और तीसरी बार फिर लगा कि गुरुदेव आए हैं। उस समय दीक्षा संस्कार चल रहा था। यज्ञ मंडप में वेदी के पास गुरुदेव का एक चित्र रखा हुआ था। संस्कार का संचालन कर रहे पंडित हृदय नारायण निर्देश दे रहे थे कि दीक्षार्थी दोनों हाथों से मुट्ठी बांधकर अपने अंगूठों के नखभाग को देखें। भावना करें कि वहां सविता देवता प्रकट हो रहे हैं। स्वयंप्रकाश ने वैसा ही किया। सविता देव की भावना करते हुए उन्हें लगा कि गुरुदेव सामने खड़े हैं। नजर उठाकर देखा-सामने उज्ज्वल सफेद धोती कुर्ता पहने एक प्रौढ़ पुरुष दिखाई दिए। उन्हें देखकर मन ही मन कहा ” कहां है गुरुदेव ? ” यह तो मथुरा से आए कोई वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं। उन्होंने आसपास देखा। भारतीय वेशभूषा धारण किए और कार्यकर्ता भी यज्ञशाला में व्यवस्था देख रहे थे। सामने उपस्थित आकृति ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और स्वयंप्रकाश के सिर पर रख दिया। स्वयंप्रकाश को लगा कि माथे पर चंदन और केसर का तिलक खिंच रहा है। वैसी ही शीतलता और पवित्रता आसपास फैलती जा रही है। इस अनुभूति के बावजूद वे ज्यादा समझ नहीं पा रहे थे। तभी आंतरिक चेतना में एक चौपाई गूंजती सुनाई दी। उस चौपाई के स्वर चित्रकूट के घाट पर चंदन घिसते हुए गोस्वामी तुलसी दास को संबोधित करते हए थे। चौपाई की दूसरी पंक्ति कह रही थी कि रघुवीर यानि भगवान राम स्वयं तुलसी दास को चंदन लगा रहे थे। इस चौपाई का साहित्यिक अर्थ जो भी हो स्वयं प्रकाश को लगा कि किसी ने गुरुदेव की प्रतक्ष्य उपस्थिति की घोषणा की

“चित्रकूट के घाट पर हुई संतन की भीड़, तुलसीदास चन्दन घिसे, तिलक देते रघुबीर”

है। घोषणा इसलिए है कि वह अपने इष्ट को पहचान नहीं पा रहे हैं। यह दृश्य बनते-बनते दीक्षा संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो गई थी। स्वयं प्रकाश ने सामने खड़ी आकृति के चरण पकड़ लिए और अपना सिर पैरों में रख दिया। यह प्रणाम स्वीकार करते हुए उस दिव्य आकृति ने अपने दोनों पांव सटा लिए थे। प्रणत साधक ने अनुग्रह माना कि यह गुरुदेव की कृपा है। उनके चरणों से कोई प्रवाह निकल रहा है। प्रकाश की तरंगों की तरह निकल रहा यह प्रवाह स्वयं प्रकाश को सभी दिशाओं से घेरे जा रहा था। लग रहा था कि अपना आत्म ही उस प्रकाश में डूबता, उतराता सराबोर होता जा रहा है।

हृदय में दीप जले :

दीक्षा के बाद स्वयंप्रकाश की साधना और उपासना निर्बाध चलने लगी थी। गुरुदेव के सान्निध्य में ही कहीं पढ़ा था कि गुरुसत्ता का वरण जीवन मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करता है। लौकिक जीवन में भी प्रगति के द्वार खोलता है। प्रत्यावर्तन शिविरों की घोषणा हुई तो स्वयं प्रकाश ने अपने आपको प्रस्तुत करने में तनिक भी देर नहीं की। मांगी गई जानकारी तुरंत भेज दी। शान्तिकुञ्ज से माताजी का पत्र, शिविर की तिथियां और तब तक की जाने वाली साधनाओं का व्यौरा भी था। उन साधनाओं को करते हुए शिविर की तिथियों का इंतजार होने लगा। तिथियां करीब आ गई और सामने ही पहुंच गई तो स्वयं प्रकाश ने कहा कि गुरुदेव के सान्निध्य में कुछ समय बिताने की चिर अभिलाषा पूरी होने की घड़ी भी आ गई। भेंट के लिए तीसरा दिन निश्चित हुआ था। वह दिन और वह क्षण भी आ गया। स्वयं प्रकाश गुरुदेव के सामने उपस्थित था। उनके सामने पहुंचकर चुपचाप खड़ा हो गया। उनकी ओर अपलक देखने लगा। कई क्षण बीत गए स्वयं प्रकाश की नज़रें गुरुदेव पर से हट ही नहीं रही थीं। उन्हें निहारे जा रहा था। इतनी तन्मयता से कि प्रणाम करना भी भूल गया। गुरुदेव ने उसे तंद्रा से बाहर निकालते हुए कहा :

” बैठ जाओ स्वयं प्रकाश । तुम्हे लगता है कि तुमने मुझे पहली बार देखा है लेकिन मैं तुम्हे बहुत पहले से जानता हूं।”

गुरुदेव के बैठ जाने का संकेत करते ही स्वयं प्रकाश ने दंडवत प्रणाम किया और उनके सामने बैठ गया। औपचरिक ढंग से गुरुदेव ने घर -परिवार ,व्यवसाय आदि के बारे में कुशलक्षेम पूछा। स्वयं प्रकाश को लगा की यह उपयुक्त क्षण है अपने मन की बात कहने के लिए। उसने कुशलक्षेम पूछते ही तपाक से कहा, गुरुदेव! घर में सब लोग ठीक हैं। आप अंतर्यामी हैं, सब जानते हैं, मैं क्या कहूं? जो कहना चाहता हूं वह भी जानते हैं। मैं किसी भी स्थिति में विवाह नहीं करना चाहता। घर परिवार की ज़िम्मेदारियों से अलग रहकर आपका काम करता हूँ। आपके सान्निध्य में और आपके बताए मार्ग पर चलते हुए। स्वयंप्रकाश ने एकाध पल का विराम लिया और इस बीच गुरुदेव ने उसकी बात पूरी की :

” स्वामी विवेकानंद है न तुम्हारे आदर्श। अगर व्यक्ति के तौर पर कहो तो स्वामी विवेकानंद बनना बड़ा आसान है। उन्हीं की तरह बोलने, वस्त्र पहनने और व्यवहार करने लगो तो बन जाओगे विवेकानंद। लेकिन उनके आदर्शों को जीना है तो अपनी चेतना को उनके स्तर तक ले जाना होगा। “

यह कहकर गुरुदेव ने स्वयंप्रकाश के सिर पर हाथ रखा। हाथ रखते ही उसके मुंह से एक हलकी सी चीख निकली और उसकी बाह्य चेतना लुप्त ( गायब ) होने लगी। शरीर निढाल सा हो गया। उस अवस्था में स्वयं प्रकाश ने देखा कि एक वैष्णव साधु से एक युवक कुछ मांग रहा है। सुनने की कोशिश की तो पता चला कि वह भगवान को पाने का उपाय पूछ रहा है। कह रहा है कि मुझे उनका दर्शन कराइए। साधु ने पूछा परिवार में कौन-कौन हैं ? युवक ने कहा माता-पिता, भाई-बहिन सभी कोई हैं। फिर साधु ने पूछा पत्नी बच्चे ? युवक ने कहा- अभी घर नहीं बसाया है। साधु ने कहा जाओ पहले घर बसाओ। प्रेम, त्याग और सहिष्णुता का जब तक अभ्यास नहीं होगा तब तक तुम भगवान के मार्ग पर नहीं चल सकोगे।।

स्वयं प्रकाश ने देखा कि सुनकर वह युवक चुपचाप चला गया। हावभाव से लग रहा था कि उसने साधु की बात मान ली है। दृश्य बदलता है। वह युवक परिवार में दिखाई देता है, पत्नी-बच्चों से घिरा हुआ। फिर वह युवक वृद्धावस्था में प्रवेश करता है और उसकी जीवन लीला पूरी हो जाती है। ये सारे दृश्य फिल्म की तरह दिखाई देते हैं। वह साधु जिसने युवक को दिशा दी थी अब भी उसी अवस्था में काशी के गंगाघाट पर स्नान-ध्यान करते दिखाई दे रहे हैं। फिर दृश्य बदलता है और कोई युवा सन्यासी दिखाई देता है। इस दृश्य के बाद स्वयं प्रकाश आँखें खोलता है और कहता है -अरे यह तो स्वामी विवेकानंद हैं। कहते हुए गुरुदेव की ओर देखता है और पूछता है वे वृद्ध संन्यासी कौन थे गुरुदेव। गुरुदेव ने कुछ नहीं कहा। स्वयं प्रकाश अपने आप बोला स्वामी रामानन्द रहे होंगे। उनके बारे में जैसा सुना, पढ़ा है वैसे ही लग रहे थे। उसने फिर गुरुदेव की ओर देखा जैसे अपने निष्कर्ष की पुष्टि चाह रहा हो। गुरुदेव ने इस बार भी कुछ नहीं कहा।

स्वयं प्रकाश अपनी सहज अवस्था में आए और चुप हो गए। उन्हें लगा कि भीतर के सब द्वन्द्व मिट गए हैं। यह भी लगा कि हो न हो, वह युवक ही अगले किसी जन्म में विवेकानंद के स्तर तक पहुंचा हो। जो दृश्य दिखाई दिए वे स्वामी विवेकानन्द के पूर्वजन्म की यात्राओं में से एक वृत्तांत भी तो हो सकता है। उसे अपने जीवन के बारे में गुरुदेव से कुछ पूछने या जिज्ञासा करने की आवश्यकता नहीं रह गई थी। वह गुरुदेव के पास कुछ समय तक चुपचाप बैठा रहा। कुछ बोला नहीं। गुरुदेव ने भी कुछ नहीं कहा।

स्वयं प्रकाश ने अपनी डायरी में लिखा कि सन्निधि के उन क्षणों में जैसे मैं गुरुदेव के स्पर्श को आत्मसात कर रहा था उनकी उपस्थिति रोम-रोम में व्याप्त हो रही थी और मेरा ‘स्व’ तिरोहित होता जा रहा था। एक स्थिति ऐसी आई कि लगने लगा अब संवाद पूरा हो गया है। न गुरुदेव ने कुछ कहा और न ही मैंने। मुझे जानने समझने के लिए कुछ आवश्यक भी नहीं लगा। चुपचाप उठा। गुरुदेव को प्रणाम किया और अपने कक्ष में वापस लौट आया।

प्राण प्रत्यावर्तन साधना में आए साधकों को अलग-अलग तरह के अनुभव हो रहे थे। अनुभूतियां साधक के अपने आंतरिक उत्साह और आकांक्षा अभीप्सा की शक्ति के अनुसार थीं। ये अनुभूतियां सत्र में अधिक और बारबार होती थीं। सामान्य दिनों में स्वास्थ्य और रोग की परीक्षा कठिन होती है। उनके लक्षण चिकित्सक के सामने ही भलीभांति व्यक्त होते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस गुरु की एक भूमिका वैद्य के रूप में भी बताते थे जिसकी उपस्थिति में रोग अधिक मुखर हो उठता था।

परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित।

इति श्री

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