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जब गुरुदेव ने लीलापत जी को कामधेनु का दूध पिलाया

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों को हमारा नमन एवं आभार
12 अक्टूबर 2020


मित्रो ,आज का ज्ञान प्रसाद एक छोटा सा संस्मरण है लेकिन है इतना मार्मिक कि हमारे मस्तिष्क की खिड़कियां खोल दे और हम सोचने पर विवश हो जाएँ कि क्या सचमुच हमारे गुरुदेव ऐसे थे। हम तो पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि गुरुदेव ने ऐसा ही साधारण, एक साधारण भारतीय का जीवन व्यतीत किया। मार्मिक संस्मरण का अर्थ होता है ऐसे यादगार पल जो आपके अंतःकरण को छू जाएँ। आज का यह संस्मरण परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के बीच का वार्तालाप है और ” पूज्य गुरुदेव के मार्मिक सस्मरण ” नामक पुस्तक में से लिया गया है। गायत्री तपोभूमि मथुरा स्थित युग निर्माण योजना प्रेस द्वारा प्रकाशित १८५ पृष्ठों की यह पुस्तक एक अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक में पूज्यवर और पंडित लीलापत शर्मा जी के वोह पल अंकित किये गए हैं जिनका एक- एक अक्षर हर गायत्री साधक के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। लीलापत जी द्वारा लिखित इस पुस्तक का मूल्य ( 2010 के अनुसार ) केवल 35 रूपए है हम तो यही आग्रह करेंगें कि आप भी इस पुस्तक को लेकर पढ़ें। internet archive नामक वेबसाइट पर यह पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है।


तो आईये चलें आज के ज्ञान प्रसाद की तरफ – लीलापत जी और गुरुदेव के बीच वार्तालाप

कामधेनु का दूध

एक दिन हम ( लीलापत जी ) छ:-सात भाइयों के साथ कोसी किसी काम से आए थे । कोसी कलां नामक यह नगर मथुरा से 45 किलोमीटर दूर है। उनको हम मथुरा लेकर आए । हमने उनसे कहा-गुरुदेव के दर्शन करके चलेंगे । वह सब राजी हो गए । हम गुरुदेव के पास बैठे थे तभी माता जी हम सबके लिए एक-एक गिलास दूध लेकर आई।
हमने माता जी से कहा,
” माता जी हम तो दूध नहीं पिएंगे । हमारे पेट में गैस बनती है।”
तब हमारा वजन भी भारी था । दूध के लिए हमने मना किया ।

गुरुदेव बोले,

” बेटा दूध पीले यह नुकसान नहीं करेगा । यह दूध कामधेनु का दूध है ।”

हमने कहा, ” कामधेनु गाय का दूध है तब तो हम अवश्य पिएँगे ।”

गुरुदेव ने कहा,

” बेटा, कामधेनु गाय के तुझे दर्शन कराएँ ? “

हमने कहा, ” अवश्य ही हम कामधेनु गाय के दर्शन करेंगे ।”

गुरुदेव ने रसोई के पास एक पीतल का घड़ा रखा था, इशारा करके कहा-

” वह कामधेनु है ।”

हमने कहा, “यह तो घड़ा है , गाय कहाँ है ? “

गुरुदेव ने कहा,

” बेटा हम आधा सेर दूध मंगाते हैं और २०० रुपये माहवार में अपना खर्च चलाते हैं। पाँच व्यक्ति हैं । ताई (गुरुदेव की माता जी) भी उस समय थीं । बेटा सात आदमी तुम हो और पाँच आदमी हम हैं , कुल १२ आदमी हैं और आधा सेर दूध है । माता जी घड़े का पानी मिलाकर चीनी मिलाकर तुमको पिला रही हैं । यह कैसे गैस पैदा करेगा? “

हमको बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि

” जिनको सारा देश गुरु मानता है वह मात्र दो सौ रुपये माहवार में घर का खर्चा चलाता है। हम सब पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा।”

गुरुदेव ने कहा :

” बेटा ब्राह्मण उसे कहते हैं जो कम से कम में अपना खर्च चलाता है। अपने लिए सुख सुविधा कम रखता है और दूसरे की सुख सुविधा का ध्यान रखता है । “

हमको बड़ी शर्म आई, एक हम ब्राह्मण जो अनाप शनाप खर्च करते हैं और अपने को ब्राह्मण कहते हैं ।

हमने कहा, ” गुरुदेव क्या दान नहीं आता है ? “

गुरुदेव ने कहा,

“बेटा दान का पैसा खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। “

हमने गुरुदेव में सच्चे ब्राह्मण के दर्शन किए और अपने को धन्य माना।

ज़रा विचार कीजिये – ऐसा था गुरुदेव का व्यक्तित्व

जय गुरुदेव

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