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परमपूज्य गुरुदेव और लीलापत शर्मा जी के पत्रों पर आधारित लेख


दिनांक ७-४-६२

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला । नवरात्रि के आपके कार्यक्रम का समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई । सामूहिक आयोजनों से धर्म चेतना बढ़ती है । आत्मशांति के लिए एकान्त साधना और धर्म सेवा के लिए सामूहिक कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है । नवरात्रि का आपका कार्यक्रम सफलता पूर्वक सम्पन्न हो ऐसी कामना है ।

कलम और वाणी ही केवल हमारी है और जो कुछ भी है दैवी है । हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति किसी के अन्तःकरण तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं । यह शक्ति तो केवल ईश्वरीय शक्ति में है । हमारी वाणी में घुलकर जब तक वह काम करेगी तभी तक उसका प्रभाव रहेगा । आपको यह सब पसंद आता है इसका कारण आपका उच्च आत्मिक स्तर ही है। कुशल समाचार भेजते रहा करो । माता जी आप सबको आशीर्वाद लिखाती हैं ।

१३ को पंजाब मेल से ग्वालियर जावेंगे । वहां से रेल द्वारा भिण्ड जाने का कार्यक्रम है । भिण्ड १४ को रहेंगे । १५ को प्रातः वहां से चल कर ग्वालियर से पंजाब मेल या जनता से झाँसी जावेंगे । झाँसी १६ को रहेंगे । १६ की रात को पैसेंजर से वापिस मथुरा चले आवेंगे ।

श्रीराम शर्मा


दिनांक १२-८-६७

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला | आप इधर जो कार्य कर रहे हैं उससे अति प्रसन्नता होती है । ऐसे ही प्रयत्न और पुरुषार्थ से नये निर्माण के सपने साकार होंगे।

आप इधर काम से निवृत्त होकर जब मथुरा आवेंगे तभी आगे का प्रोग्राम बनेगा । आपके परामर्श से ही आगे की गतिविधियों का निर्धारण होगा। आशा है आपके प्रयत्न से दुकान का कुछ काम जमा होगा |

आप कब मथुरा आ रहे हैं सो लिखें । उधर से निवृत्त होकर ही आना ठीक रहेगा । घर में सबको हमारा आशीर्वाद और माता जी का स्नेह कहें ।

श्रीराम शर्मा


ऑनलाइन ज्ञानरथ के साधकों को हमारा वंदन एवं आभार

१० अक्टूबर २०२० का ज्ञानप्रसाद

आज १० अक्टूबर का ज्ञान प्रसाद आपके समक्ष प्रस्तुत करते अत्यंत हर्ष हो रहा है। पिछले दो दिन से हमारा प्रयास उस वीडियो को बनाने में लगा रहा जो हमने स्वयं गायत्री तपोभूमि मथुरा में जाकर बनाई थी। आप पूछेंगें कि केवल १२ मिंट की वीडियो को बनाने में दो दिन लग गए, लोग तो एक -एक घंटे में कितनी ही वीडियो अपलोड किये जा रहे हैं। यहाँ आता है हमारे गुरुदेव का मार्गदर्शन। जैसा गुरुदेव निर्देश दे रहे हैं वैसा हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जो भी काम हम करते हैं इतनी श्रद्धा और निष्ठां के साथ सम्पन्न करते हैं कि हमारी आत्मिक शांति तभी होती है जब हमारे परिजन संतुष्ट होते हैं। आप सबके कमेंट इस तथ्य के साक्षी हैं कि आपको हमारा कार्य पसंद आ रहा है। दिन प्रतिदिन नए परिजन ज्ञानरथ में समिल्लित हो रहे हैं और वह भी आपके पुरषार्थ का ही परिणाम है। जिन परिजनों ने अपनी दिनचर्या ही बना ली है कि एक नियत समय पर हमें कमेंट भेजना ही है उनको हमारा नमन एवं ह्रदय से आभार।

इस भूमिका के साथ चलते हैं परमपूज्य गुरुदेव एवं आदरणीय लीलापत जी के दो और पत्रों के ऊपर चर्चा। आज के लेख में दो पत्र : 7 अप्रैल 1962 और 12 अगस्त 1967 के समिल्लित किये हैं। अगस्त वाला पत्र तो शायद ” पत्र पाथेय ” पुस्तक का अंतिम पत्र था। लेकिन अगर हम इन दोनों पत्रों की शैली और भाषा देखें तो आत्मीयता और स्नेह इस प्रकार झलक रहा है जिसके लिए अक्षर कम पड़ जाते हैं। गुरुदेव ने लीलापत जी को ऐसा शिक्षण प्रदान किया और पल -पल पर ,कदम कदम पर मार्गदर्शन देते रहे जो हम सबके लिए एक अभूतपूर्व उदाहरण है। लीलापत जी की गुरुभक्ति भी हमें प्रेरणा देती है तभी तो वंदनीय माता जी एवं गुरुदेव उनको अपना बड़ा बेटा
मानते थे।

ग्वालियर डिस्ट्रिक्ट में स्थित डबरा नगर शुगर मिल के लिए प्रसिद्ध है और लीलापत जी उसमें कार्य करते थे। गुरुदेव के साथ सम्पर्क में आने के समय मिल एसोसिएशन के प्रेजिडेंट भी थे।जब गुरुदेव ग्वालियर ,झाँसी ,भिंड इत्यादि क्षत्रों में अपने कार्यक्रम करते तो लीलापत जी के व्यक्तित्व का लाभ मिलता और मिल कर्मचारी काफी सहयोग देते। गुरुदेव ने लीलापत जी के अंदर समर्पण की भावना देख ली थी और उन्हें मथुरा तो लेकर आना ही चाहते थे लेकिन पारिवारिक और मिल की ज़िम्मेदारिआं आड़े आ रही थीं। 1962 वाले पत्र में एकांत साधना और धर्म सेवा पर गुरुदेव ने जो पंक्ति लिखी है उस पर चर्चा करना इस लेख के प्राण हैं :

” आत्मशांति के लिए एकान्त साधना और धर्म सेवा के लिए सामूहिक कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है “

हम सब कभी न कभी अकेले बैठ कर कुछ न कुछ पढ़ते हैं और जो पढ़ते हैं उसके बारे में सोचते हैं ,मनन करते हैं ,विश्लेषण करते हैं और कई बार किसी निर्णय तक भी पहुँच जाते हैं। इसी चिंतन-मनन से हमारी कुछ धारणा ( viewpoint ) भी बन जाती है। अब हम पर ,केवल हम पर ही निर्भर करता है कि जो हम पढ़ रहे हैं उससे हमें आत्मिक शांति मिल रही यां आत्मिक अशांति। जब हम यह कह रहे हैं कि केवल हम पर ही निर्भर है तो यह सही है – यह सही इस लिए है कि हमारा ही चयन है , हमने ही चुना है कि हमने क्या पढ़ना है। गीता उपदेश भी इसी मार्ग की तरफ लेकर जाता है :

” आंखें है तो देखेंगीं ही ,कान है तो सुनेंगें ही लेकिन क्या देखना ,क्या सुनना , इसका चयन तो हमने ही करना है “

शायद यही कारण था कि लीलापत जी कई -कई घंटों इन पत्रों के अक्षरों को ,उनकी बनावट को और अक्षरों की शैली को देखते रहते थे। इन अक्षरों में वह गुरुदेव को ढूंढ़ते थे। – वाह रे समर्पण और श्रद्धा। इसी से उन्होंने आत्म परिष्कार किया।

तो अब आती है धर्म सेवा की बात। गायत्री परिवार की सेवा के लिए ही तो इतने बड़े- बड़े सामूहिक यज्ञों का आयोजन होता रहा है ,108 कुंडीय यज्ञ ,सहस्र कुंडीय यज्ञ इत्यादि ,इत्यादि। इन आयोजनों में गीत -संगीत का महत्व तो है ही , उद्बोधन से participants को नई ऊर्जा ,मार्गदर्शन के साथ -साथ सेवा तो अवश्य ही होती है। इसी सेवा को क्रियान्वित करने के लिए हर वर्ष श्रद्धेय डॉक्टर साहिब , चिन्मय भाई साहिब अपनी टोली के साथ अमरीका -कनाडा के दौरे लगाते हैं। भारत में तो ऐसे आयोजनों की गणना ही नहीं की जा सकती। आज कल COVID -19 के प्रतिबंधों के कारण ज़ूम मीटिंग्स हो रही हैं। सम्पर्क स्थापित करना और उसको कायम रखना अत्यंत आवश्यक है। हम भी संपर्क की आवशयकता पर कई बार कह चुके हैं। जो परिजन ज्ञानरथ से शुरू से जुड़े हुए हैं उनका लेख पढ़ने के लिए आभार तो है ही लेकिन जो सुझाव और मार्गदर्शन उनके द्वारा हमें मिला है उसकी भी कोई तुलना नहीं है।

हमारे परिजन देख रहे होंगें कि इतने छोटे पत्रों में कितनी philosophy छिपी हुई है। यह कोई ऐसा वैसा साहित्य नहीं है इसमें दैवी शक्ति सम्माहित है। गुरुदेव खुद 1962 वाले पत्र में लिख रहे हैं :

” कलम और वाणी ही केवल हमारी है और जो कुछ भी है दैवी है । हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति किसी के अन्तःकरण तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं । यह शक्ति तो केवल ईश्वरीय शक्ति में है । हमारी वाणी में घुलकर जब तक वह काम करेगी तभी तक उसका प्रभाव रहेगा । आपको यह सब पसंद आता है इसका कारण आपका उच्च आत्मिक स्तर ही है।”

इतना down -to – earth व्यक्तित्व केवल हमारे गुरुदेव का ही हो सकता है। इतने बड़े ,विशाल गायत्री परिवार के
जन्म -दाता, संचालक अपने आपको तुच्छ व्यक्ति कह रहे हैं और सारे का सारा श्रेय उस परमपिता परमात्मा ,दैवी शक्ति को दे रहे हैं। तुच्छ के प्रायवाची अक्षर petty , humble हो सकते हैं। लीलापत जी को इन्ही पत्रों से प्रेरणा मिली होगी और उनके जीवंत शिष्य बन गए।

क्या हम ऐसा समर्पण और संकल्प दिखा सकते हैं ? अवश्य ,अवश्य – आइये हम सब इकठे हो कर सामूहिक नमन करें और आज का लेख को यहीं विराम दें।

कमेंट करके अवश्य बताएं कि लेख कैसे लग रहे हैं अतः सुझावों का सदैव स्वागत है।

जय गुरुदेव

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