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शांतिकुंज तो महाकाल का घोंसला है

23 सितम्बर 2020 का ज्ञान प्रसाद , अखंड ज्योति दिसंबर 2002

बात 1989 दिसम्बर की है। गुरुदेव गोष्ठियां कर रहे थे और अपने परिजनों, सहकर्मियों के ऊपर अपना स्नेह अनवरत बिखेर रहे थे। वातावरण में कुछ- कुछ सर्दी का अहसास हो रहा था परन्तु गुरुदेव के स्नेह की गर्मी गोष्ठियों में फील की जा रही थी। आज की अमृत कथा में गुरुदेव साधना पूर्ण जीवन के कुछ रहस्यमय सूत्र बता रहे थे।

गुरुदेव कह रहे थे :

” सबसे पहले हमारी बात गांठ बांध लो। साधना कोई किताबें पढ़ने का नाम नहीं है। छोटे बच्चे को A फॉर apple हम पढ़ाते तो ज़रूर हैं लेकिन इसे खाने को तो नहीं देते। अगर बच्चा ज़िद करे कि मैंने apple खाना है तो आपको कम से कम फ्रिज तक तो जाना पड़ेगा ,apple छीलना पड़ेगा , काटना पड़ेगा ,फिर बच्चे के हाथ में देना पड़ेगा। इससे भी अधिक अगर फ्रिज में apple नहीं हैं तो बाजार जाकर लाने पड़ेंगें ,पैसे खर्च करने पड़ेंगें इत्यादि ,इत्यादि। अखंड ज्योति पत्रिका यां गायत्री महाविज्ञान के पन्ने ,उल्टने से ,चित्र देखने से कुछ भी नहीं मिलने वाला। इन पुस्तकों के अंदर छुपा है ” ज्ञान का महत्व”। फिर गुरुदेव आहिस्ता से बोले – गायत्री महाविज्ञान में जो लिखा है उसे श्रद्धा पूर्वक ,लम्बे समय तक करके देखो तुम्हारा पूरा जीवन बदल जायेगा। इसमें एक भी अक्षर ऐसा नहीं है जिसकी अनुभूति मेरे जीवन से न गुज़री हो। इसमें लिखी हुई बात चाहे वह चौबीस हज़ार के लघु अनुष्ठान हों यां कोई और बात पूरे अनुशासन से लगातार करते जाओ और फिर देखो बदलाव कैसे आता है “

गुरुदेव की बातें सभी लोग बड़ी श्रद्धा और समर्पण से सुन रहे थे ,आखिर यह अमृत वचन ही तो हैं ,अमृत गंगा ही तो है , शांतिकुंज की पावन भूमि ,सप्तऋषियों की तपोभूमि कोई ऐसी वैसी भूमि तो हो ही नहीं सकती। यह वचन सुनने वालों के ह्रदय
तक सीधे उतरे जा रहे थे।

ऐसा ही प्रयास हमारा भी रहता है कि आप जिस भी लेख को पढ़ें उसकी अनुभूति बिल्कुल वैसी हो जिस भावना से लिखा गया है। गुरुदेव ने तो 24 वर्ष तक बिना किसी प्रश्न के घोर साधना की, अपने मार्गदर्शक का आदेश मानते रहे। क्या हम इतने लम्बे समय के लिए समर्पित हो सकते हैं ? पिछले ही लेख में हमने लिखा था कि इस युग में हम में से बहुत ऐसे हैं जो गुरु इस तीव्र गति से बदलते हैं जितनी गति से कपडे भी नहीं।

आइये आगे चलते हैं :

गुरुदेव की साधना वाली बात को एक प्रश्न ने नया मोड़ दे दिया। प्रश्न था :

” साधना में वातावरण का बहुत महत्व है क्या ? “

इस प्रश्न ने वातावरण में एक चुप्पी छेड़ दी। गुरुदेव भी कुछ गंभीर हो गए। गुरुदेव के आध्यात्मिक तेज से परिपूर्ण नेत्रों का प्रकाश सभी पर कुछ देर तक पड़ता रहा। गुरुदेव बोलने लगे :

” बेटा वातवरण का महत्व असाधरण और अद्भुत है परन्तु इसको ग्रहण करने के लिए, धारण करने के लिए योग्यता भी चाहिए। अब देखो न साधना के लिए सबसे अच्छा वातावरण हिमालय का वातावरण है ,परन्तु एक बात सोचने ,समझने वाली है। वह यह कि – क्या हिमालय में रहने वाले सभी लोग उस वातावरण का लाभ उठा सकते हैं ? मैं जब हिमालय गया तो देखा, दो साधु वेषधारी थोड़ी सी भूमि के लिए झगड़ा कर रहे थे। नौबत यहाँ तक पहुँच गयी थी कि एक दूसरे के गले पकड़ने लगे थे। एक तरफ यह लोभी ,लालची साधु और दूसरी तरफ साधनासम्पन्न ऋषि और महायोगी जिन्होंने हिमालय के वातावरण में अपने आप को पूरी तरह डुबो दिया है। “

यह कहते हुए गुरुदेव ने एक अद्भुत रहस्य उद्घाटित किया।
गुरुदेव बोले :

” बेटा ,आपको हिमालय जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैंने साधना का वातवरण प्रदान करने के लिए ही युगतीर्थ शांतिकुंज बनाया है। यह युगतीर्थ एक अद्भुत ,संस्कारवान भूमि पर स्थित है। हिमालय के ऋषियों और दिव्य सत्ताओं ने अपनी छाया प्रदान की है। मैने और माता जी ने आप सबके लिए यहाँ अपने जीवन की समस्त तप शक्ति लगा दी है। यहाँ हिमालय का स्थूल स्वरूप तो नहीं है परन्तु यहाँ पर साधना करने वालों को अद्भुत परिणाम मिले हैं। देवात्मा हिमालय मंदिर एक अद्भुत मंदिर है , लोग अक्सर इस मंदिर में साधना करते हैं। गुरुदेव कह रहे थे -शांतिकुंज इस पृथ्वी पर एक ऐसा दुर्लभ और विरल दिव्य धाम है जो है तो इसी धरती पर परन्तु इसकी चेतना पूरी तरह अलौकिक है। “

आगे चलने से पहले हमें ” अलौकिक ” का अर्थ जानना चाहिए।

Good ,better , best में best को superlative डिग्री कहते हैं। super का अर्थ great , fantastic यां फिर सु – ऊपर यानि सबसे ऊपर। जब हम सुप्रभात कहते हैं तो भाव होता है सबसे ऊपर वाली सुबह। superman का अर्थ है सबसे ऊपर वाला मानव। अलौकिक का अर्थ है सबसे ऊपरवाला लोक , एक अद्भुत लोक।

यह व्यख्यान देते हुए गुरुदेव थोड़े गंभीर भाव में डूब गए और उनके भाव में एक परिवर्तन दिखाई दिया। गुरुदेव खिन्न ( दुखी ) ह्रदय से बोले :

” मैंने थाली तो परोस कर रख दी है ,पर तुम लोग खा भी नहीं सकते। यहाँ रहने वालों पर मुझे तरस आता है। आ तो गए हैं, घर से कह कर आये थे कि गुरु जी का काम करने जा रहे हैं और साधना करेंगें। माँ -बाप को रुलाया ,रिश्ते -नातेदारों को दुखी किया ,पर यहाँ आकर इंचार्ज बनने के फेर में पड़ गए। जो कुंवारे हैं ,वह शादी के चक्र में ,जो विवाहित हैं वोह बच्चों के चक्र में ,जिनके एक बच्चा है , उन्हें और चाहिए, कार्यकर्ता स्वयंसेवक बनने में शान नहीं महसूस करते ,इंचार्ज बनना चाहते हैं ,मैनेजर बनने के लिए परेशान हैं। “

इन शब्दों में गुरुदेव की गहरी पीड़ा झलक रही थी। अपने बच्चों के लिए टीस और दर्द था। बिना किसी विराम के गुरुदेव कह रहे थे :

” वातावरण का लाभ लेने के लिए उसमें अपने आप को डुबाना पड़ता है। दुनिया की चिंता छोड़ कर उसमें अपने भाव भिगोने पड़ते हैं। वातावरण के प्रवाह में अपने प्राणों को प्रवाहित करना पड़ता है। ऐसा करके देखो फिर बताओ शांतिकुंज का वातावरण चमत्कारी है कि नहीं। तुम लोगों के पास काम अधिक है ,अनुष्ठान न कर सको तो 24 घंटे सोते -जागते यही सोचो कि शांतिकुंज में चारों ओर गुरूजी का तप ,प्राण बिखरा पड़ा है और हम उसे अपने रोम -रोम में ,प्राण में ग्रहण कर रहे हैं ,धारण कर रहे हैं। गुरूजी की तपस्या हमारे आंतरिक जीवन को दिव्य और बाहरी जीवन को नैतिक व निर्मल बना रही हैं। इस भाव को दो वर्ष तक जी कर देखो फिर देखो चमत्कार। अरे बेटा शांतिकुंज कोई साधारण जगह नहीं है। यह शिव की काशी है जहाँ स्वयं माता अन्नपूर्णा रहती हैं ,स्वयं हम रहते हैं। हम दोनों की देह रहे या न रहे हम दोनों सर्वदा यहीं पर रहेंगें। हम दोनों किसी भी हाल में अपने इस दिव्य धाम को छोड़ने वाले नहीं हैं। शांतिकुंज तो महाकाल का घोंसला है। यहाँ महाकाल स्वयं रहते हैं। सृष्टि की अनेकों दिव्य शक्तियां यहाँ हमेशा क्रियाशील रहती हैं। जो साधना करेगा वही इस रहस्य को जान पायेगा। यहाँ पर छोटी सी भी साधना बड़े परिणाम देगी। करके तो देखो। “

मन को मथने वाली गुरुदेव की बातों ने वहां बैठे लोगों के अंतःकरण में हलचल मचा दी। अगर आपके मन में भी इस तरह की फीलिंग हो रही है तो परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा को आपने शिरोधार्य कर लिया है।

महासिद्ध गुरुदेव के सच्चे साधक होने में ही गुरु की शान है , आईये इसी शान के साथ गुरुदेव का ध्वज ,गायत्री परिवार का ध्वज ,ज्ञानरथ का ध्वज विश्व के घर- घर में स्थापित करें।
जय गुरुदेव

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