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पिसनहारी का कुआँ :

जून 1971 को गुरुदेव मथुरा छोड़ कर शांतिकुंज आ गए। उसी वर्ष गायत्री जयंती वाले दिन अपने अंतिम उद्बोधन में गुरुदेव ने परिजनों को माँ गायत्री के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान दिया। ज्ञान के साथ -साथ गुरुदेव कई प्रकार के उदाहरण दिए जा रहे थे। उस ज्ञान क बारे में तो हम अगले लेखों में चर्चा करेंगें। परन्तु एक उदाहरण जो है तो बहुत ही छोटा लेकिन भाव बहुत ही उच्च हैं, आज आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है आप अवश्य ही इससे से प्रेरित होंगें और आगे ही आगे शेयर करते जायेंगें। इस उदाहरण को पढ़ते ही हमने इसकी सत्यवादिता के लिए गूगल सर्च किया और देखा कि प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद ने इस पर एक कहानी भी लिख डाली है। तो आइये देखते हैं पिसनहारी की कहानी।

पिसनहारी का कुआँ :

गुरुदेव ने उद्बोधन में कहा :

अगर कभी आपका मन करे तो यहाँ से केवल दो किलोमीटर दूर ” पिसनहारी का कुआँ ” है , वहां अवश्य जाइये। पिसनहारी केवल 12 वर्ष की आयु में विधवा हो गयी। चक्की में गेहूं पीस कर अपना पेट भरती थी। कई बार तो सारी -सारी रात लगी रहती। जितने पैसे कमाती उसमें से 1 पैसा अलग रख देती। इस तरह एक -एक पैसा जोड़ कर उसने 500 रुपए इक्क्ठे कर लिए। 1971 के 500 रूपए आज 2020 में लगभग 15 लाख रुपए बनते हैं। जब मृत्यु का समय आया तो उसने गांव वालों को बुलाया और कहा :

” मेरे सारे जीवन की धर्म की कमाई यह 500 रुपए हैं। इन पैसों से यहाँ एक कुआँ बनवा दिया जाये। यहाँ पर पानी का बड़ा अभाव है , आते जाते लोग अपनी प्यास बुझाएंगें और मेरी धर्म की कमाई का लाभ उठाएंगें “

गुरुदेव कह रहे थे :

” इस कुएं का पानी बहुत ही मीठा और बढ़िया है। बाकी सारे कुओं का पानी खारा है। लोग आते हैं वृक्षों की छाया में बैठते हैं ,शीतल जल ग्रहण करते हैं और पिसनहारी को याद करते हैं। लेकिन पिसनहारी का कहीं कोई फोटो नहीं है ,इसकी शान में कोई जुलुस कभी नहीं निकला। लोग याद करते हैं हिटलर को , चंगेज़ खान को नादिरशाह को और अल्फर्ड नोबेल को जिसने डायनामाइट ( explosive ) का अविष्कार किया। यह वही नोबेल हैं जिनके नाम पर विश्व भर में नोबेल प्राइज दिए जाते हैं। हमारे बच्चे इन्ही का इतिहास पढ़ते हैं। पिसनहारी का नाम किसी इतिहास की पुस्तक में नहीं मिलता।”

हमें अपने पाठकों का तो पता नहीं ,परन्तु जब हमने इस कहानी को पढ़ा , तो बार -बार पढ़ते ही गए और अपने आप पर ,अपनी false prestige पर घृणा सी होने लगी। कुएं तो टाटा ,बिरला कइयों ने बनवाये होंगें ,कितने ही स्कूल ,हस्पताल उनके नाम से चल रहे हैं लेकिन उनका पुरषार्थ और पिसनहारी का पुरषार्थ अलग ही तरह के हैं। हमारे पाठकों ने ” कौन बनेगा करोड़पति ” में कितने ही इस तरह के प्रेणादायक प्रसंग देखे होंगें -सभी को नमन।

गुरुदेव ने इस कहानी की चर्चा गायत्री मन्त्र की महिमा करते हुए की थी। बहुत ही गहराई से समझने वाली महिमा है। हम कई दिनों से इसका अध्यन कर रहे हैं और आशा करते हैं की शीघ्र ही आपके समक्ष सरल भाषा में लेकर आयेंगें। गुरुदेव के साहित्य को सरल भाषा में ,रोचक ढंग से प्रस्तुत करना इन लेखों का उदेश्य है। लेकिन इस बात का ध्यान पूर्णतया रखा जाता है कि तथ्यों के साथ कोई खिलवाड़ न हो।

पिसनहारी की कहानी समाप्त करने से पूर्व हम अपने सहकर्मियों के साथ एक और बात शेयर करना चाहेंगें।

वरिष्ठ सहकर्मी जसोदा जी और विद्या परिहार जी ने अविस्मरणीय photos भेज कर हम सब को बहुत ही कृतार्थ किया है ,ह्रदय से दोनों का आभार। अब यह कार्य इतना आसान नहीं रह गया है। इसके ऊपर थोड़ा अधिक समय लगना चाहिए और पाठकों को और समय देना चाहिए। बहुत से लोगों ने अपने फ़ोन नंबर भेजें हैं , सब का धन्यवाद्। फ़ोन नंबर भेजने को हर किसी का स्वागत है।

आज यहीं विराम लेंगें। सभी को शुभ दिन की मंगल कामना।

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