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महर्षि रमण के साथ गुरुदेव की अकेले में भेंट-अंतिम ,पार्ट 3

इन लेखों की कड़ी के पार्ट 2 में हम आपको गुरुदेव और रमण महर्षि के बीच संक्षिप्त वार्ता बता रहे थे।
तो आओ चलें पार्ट 3 की ओर

लगभग साढ़े आठ बजे गुरुदेव और आगुन्तकों के साथ रमण महर्षि की कुटिया के बाहर बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। महर्षि आये सभी ने अभिवादन किया। प्रणाम आदि के उपरांत महर्षि ने पहला प्रश्न गुरुदेव से ही कर डाला ,ऐसा प्रश्न जिसकी गुरुदेव को आशा ही नहीं थी , ” क्या करते हो ? ” लेकिन फिर भी गुरुदेव ने उत्तर दिया ,” राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समाज में गौरव जगाता हूँ , इसके लिए लेखनी और वाणी का प्रयोग करता हूँ ” महर्षि ने कहाँ :

” यह पर्याप्त नहीं है। अपनी आत्मा में बल जगाओ ,आत्मतेज की उपासना करो , वह तो तुम कर ही रहे हो ,तुम्हे सिद्ध योगियों की कृपा प्राप्त है ,तुम एक कदम उठाने की चिंता करो ,उस एक कदम को उठाते ही अगले पथ के लिए स्थान अपने आप ही प्रकाशित हो उठेगा। “

महर्षि कह रहे थे और गुरुदेव की आँखों में देखे जा रहे थे। उन्होंने कहा :

” लोग समझते हैं की आंदोलन से ही सब कुछ हो जायेगा। उनका अपना ही महत्व है। आंदोलन में शक्ति आध्यात्मिक उपायों से ही आती है। वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ने तप किया था , तब रावण का आसुरी आंतक समाप्त हुआ। कंस को मारने के लिए भगवान विष्णु खुद ही आ गए थे। असुरों को मारने के लिए ऋषियों ने तप किये थे। तप की शक्ति हो तो मामूली से दिखने वाले लोग भी चमत्कार कर सकते हैं “

इस पर गुरुदेव ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुछा :

” क्या आप चमत्कारों को मानते हैं ? प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करके ही तो चमत्कार होते हैं “

महर्षि ने उत्तर दिया :

” संसार में चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं है। जिन्हे हम चमत्कार समझ बैठते हैं ,हैरान हो जाते हैं वह वास्तव में प्रकृति के नियमों को न समझ पाने के कारण ही होता है। मनुष्य के जीवन कुछ न कुछ अप्रत्याशित और अनायास ही घटता रहता है। वह कहीं और से नहीं आता है ,मनुष्य का अपना प्रारब्ध ही होता है। इस स्थिति में योगीपुरष केवल इतना ही करते हैं कि वह अपने तेज से ,तप से इसको समय से पहले प्रकट करवा लेते हैं “

गुरुदेव महर्षि रमण की गोष्ठियों में आते रहे जिनमें अधिकतर चर्चा साधना और अध्यात्म की ही चलती थी। अपने तर्क को परिप्कव करने के लिए कभी कभार देश दुनिया की भी बाते करते थे। हमें भी कई बार इन लेखों को लिखते समय आजकल के तथ्यों का ,यां फिर अपने अनुभव का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन हमें हर समय अपने सहकर्मियों के अमूल्य समय का और तथ्यों की स्पष्टता का ध्यान रखना ही पड़ता है। हम नहीं चाहते कि हमारे पाठक हमारी बातों में बह कर मूल टॉपिक को ही भूल जाएँ। हम कभी नहीं चाहते कि गुरुदेव के साहित्य में कोई तोड़-मरोड़ हो।

महर्षि अधिकतर सामूहिक आयोजनों में ही परिजनों को सम्बोधित करते थे, वहीँ पर उनके प्रश्नों ,जिज्ञासाओं और परेशानिओं का निवारण भी करते थे , लेकिन उस दिन गुरुदेव को बहुत ही आश्चर्य हुआ जब महर्षि ने अकेले में मिलने का सन्देश भेजा। यह सन्देश आश्रम में वर्षों से रह रहे गणपति शास्त्री के हाथों भेजा था। शास्त्री जी भी अकेले मिलने को लेकर आश्चर्यचकित हुए थे। उन्होंने सन्देश देते हुए इतना ही कहा था – आप पर भगवान की कृपा बरसने वाली है ,महान कृपा। गणपति शास्त्री जी संस्कृत के महान विद्वान थे ,उन्होंने ही रमण जी को महर्षि और रमणन की उपाधियों से विभूषित किया।

जब गुरुदेव महर्षि के पास पहुंचे तो उन्होंने उनके प्रणाम करने से पहले ही हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दिया। बैठने का संकेत करते हुए कहने लगे ।

” तुम्हारे यहाँ आने का कोई विशेष लौकिक (सांसारिक) प्रयोजन नहीं है ,मार्गदर्शक सत्ता तुम्हे यहाँ खींच कर लाई है ,ठीक है न “

गुरुदेव ने केवल हाँ में सिर हिलाया।

महर्षि ने पूछा ,


” साधना और स्वतंत्रता के काम में कोई तालमेल दिखाई देता है ? नहीं न , तो फिर तुम्हारा यहाँ पर आना एक आत्मन विकास का संकल्प है। जो जितना संकल्पित होगा उसका उतना ही विकास होगा। उस उच्च सत्ता के प्रति अपनेआप को ,अपने आत्मन को सदैव खुला और समर्पित रखना चाहिए। जो व्यक्ति जितना खुला और समर्पित होगा उसका विकास उतना ही अधिक होगा। “

महर्षि रमण ने यह कह कर इस तथ्य को परिपक्व किया कि जो जितनी श्रद्धा से ,संकल्प से ,निष्ठां से ,और निस्वार्थ हो कर कोई कार्य करेगा अदृश्य सत्ता उसका उतना ही साथ देगी और उसका परिणाम दिव्य चेतना पर निर्भर है। अपने कार्य को निस्वार्थ और निष्काम भाव से करते रहने के महत्व को कोई भी नकार नहीं सकता। आज का मानव, हम सब , इतने भटके हुए हैं और कामनाओं से इतने अधिक लालायित हैं कि समर्पण की भावना को भूल ही गए हैं। हम लोग अक्सर उस दिव्य सत्ता को ,परमपिता को शिकायत ही करते रहते हैं ,अरे भैया हमारे जीवन में हमारे कर्मों का भी कुछ रोल है।

गुरुदेव के साथ इन एकांत के पलों में महर्षि कई विषयों पर चर्चा करते रहे उनसभी का विवरण देना शायद संभव न हो लेकिन एक घटना जो जातिवाद ( जिसने हमारे समाज को ग्रसित किया है ) से सम्बंधित है उसका वर्णन करना उचित होगा। तो आईये देखते हैं क्या थी वह घटना।

अरुणाचल पर्वत साधना के प्रारंभिक दिनों में महर्षि रमण इधर उधर विचरण करते रहते थे। कभी शिखर पर चढ़ जाते, कभी परिक्रमा करते ,कभी परिसर में बैठ जाते। वह अधिकतर कौपीन ( लंगोट ) धारण किए रहते थे। कभी -कभी तो लोग उन्हें भिखारी समझ कर कुछ सिक्के दे जाते और वह चुपचाप रख लेते। हम उस महापुरष की बात कर रहे हैं जिसे सारे विश्व में महर्षि रमण के नाम से जाना जाता है और किसी भी धर्म वंश को एक तरफ रख कर सब उनकी पूजा करते हैं। हमारा सौभाग्य है कि गुरुदेव के सानिध्य ने हमें उनके साथ मिलाया।

अब आती है उस जातिवाद की घटना। एक बार घूमते -घूमते महर्षि किसी गुफा के पास से निकले। उस गुफा में एक ज़हरीला सांप रहता था। महर्षि गुफा के सामने ध्यान लगा कर बैठ गए। ध्यान की अवस्था इतनी प्रगाढ़ थी कि उन्हें पता ही नहीं चला कि गुफा से निकल कर वह सांप उनकी पीठ ,पेट और कमर पर लिपट कर बैठ गया। पहाड़ी पर लकड़ियां इक्क्ठी कर रही एक वृद्ध महिला ने यह देखा तो उसने शोर मचाया। महर्षि ध्यान में इतने मग्न थे कि उन्हें कुछ पता नहीं। उस महिला ने हुश- हुश की आवाज़ भी निकाली लेकिन महर्षि को कोई ध्यान नहीं। महिला ने लकड़ियां काटने वाले हँसिए ( औज़ार ) से सांप को छेड़ा। छेड़ने से सांप महर्षि को छोड़ कर रेंगता हुआ अपनी बिल में चला गया। जहाँ -जहाँ सांप लिपटा हुआ था वहां निशान पड़ गए थे। उस महिला ने अब महर्षि को एक नुकीला औज़ार चुभाया। इससे महर्षि का ध्यान टूटा। महिला ने रोष में कहा – तुम मर जाओगे ,कहीं के नहीं रहोगे ,एक जगह पर टिक कर क्यों नहीं बैठते। वह महिला अस्पृश्य (अछूत ) लगती थी लेकिन कोई साधारण महिला नहीं थी। उसके भीतर दिव्य चेतना विद्धमान थी। कभी यह भी लगा कि वह तिरुवन्नामलई में
पहले कहीं साधना कर चुकी सिद्ध आत्मा थीं। इस घटना के बाद महर्षि ने इस तरह विचरण करना बंद कर दिया और तलहटी में कुटिया बनाकर रहने लगे। सांप के स्वाभाव की बात की जाए तो वह उस सिद्ध महिला के हुश -हुश करने पर चला क्यों गया। महिला को यां महर्षि को डस क्यों नहीं लिया। महर्षि ने महिला और सांप के लिंक को वर्णित करते हुए कहा

” सांप कुंडलिनी शक्ति का स्थूल रूप था और वह महिला दिव्य ऊर्जा थी। “

रमण आश्रम में गुरुदेव चार दिन रहे, आश्रम प्रणाली का ज्ञान प्राप्त किया और उनके प्रवचन का आनंद प्राप्त किया। महर्षि का मुख्य सन्देश अद्वैत वेदांत से मिलता जुलता था। उनका जो भी वचन था सब का सब अपने ही अनुभव से आया था और दिन प्रतिदिन में घटित बातों की चर्चाओं पर आधारित था। महर्षि आश्रम के सभी क्रिया कलापों पर पूरी दृष्टि रखते,यहाँ तक कि भोजनालय में क्या पक रहा है। भोजन बन जाने पर उसे स्वयं चखते भी, उसमें कोई कमी होती तो बताते भी। शायद यही परम्परा गुरुदेव वहां से लेकर आए। माता भगवती भोजनालय जिसको माता जी के चौके का नाम भी दिया है शांतिकुंज और दूसरे संस्थानों पर ऐसे ही चल रही है। गुरुदेव के आश्रम से विदा होने वाले दिन महर्षि ने एक कार्यकर्त्ता को डांटा। उस कार्यकर्त्ता की गलती थी कि उसने आश्रम के एक बंदर को डंडे से मारा था। महर्षि बंदरों का बहुत ही आदर करते थे। उन्हें चने और खाद्य पदार्थ अर्पण करते थे। उन्होंने कार्यकर्ता को डाँटते हुए पूछा ” बंदर को डंडा मारने की क्या आवश्यकता थी ?” कार्यकर्ता ने कहा- वह बंदर बच्चों को घूर रहा था। महर्षि ने कहा

” अगर बंदर घूर रहा था तो तुम भी घूर देते ,डंडा मारने की क्या आवश्यकता थी । भविष्य में ध्यान रखना “

इतनी सी बात में ही कार्यकर्ता को डांट सी लगी ,उसे लगा कोई बड़ी भूल हो गयी है। इसका प्राश्चित करना चाहिए। उसने महर्षि के सामने प्रस्ताव रखा की मैं अपनी भूल को सुधारने के लिए उपवास करूँगा और यह कहते- कहते कार्यकर्त्ता रुआंसा सा हो गया। महर्षि ने इस प्रसंग को विनोद भाव में लिया। कहने लगे ,

” उपवास करने की कोई आवश्यकता नहीं है ,अगर पश्चाताप ही करना चाहते हो तो एक काम करो। उस बंदर को ढूंढो और उससे कहो कि वह भी तुम्हे डंडा मारे “

यह कह कर महर्षि हँसे और बाकि सभी भी हंस पड़े। गुरुदेव ने इस प्रसंग को अपनी डायरी में नोट कर लिया। बाद में उन्होंने कई और भी
संवेदना,न्याय,पश्चाताप ,व्यवस्था ,विवेक जैसे भाव अपनी डायरी में लिख लिए। गुरुदेव का ह्रदय ही एक खुली डायरी है ,जीवन के हर पहलु को उन्होंने वाटिका के पुष्पों की भांति संजो के रखा है।

पोंडिचेरी अरुणाचल से कोई अधिक दूर नहीं था। वहां का अरविन्द आश्रम अपना आकार ले चुका था। देश -विदेश के बुद्धिजीवी ,दार्शनिक ,चिंतक ,राजनेता वहां आने जाने लगे थे। गणपति शास्त्री ने गुरुदेव को वहां भी जाने के लिए कहा। लेकिन गुरुदेव ने फिर कभी आने का कह कर यह कारण दिया कि इस बार केवल महर्षि रमण से प्राप्त ऊर्जा से इस चेतना को जागृत रखना है।

तो मित्रो अरुणाचल पर्वत की ,भगवान शिव की महिमा और महर्षि रमण के बारे में हमने आपको संक्षिप्त में तीन लेखों में वर्णित करने का प्रयास किया। इस अंतिम लेख को समाप्त करने से पहले हम कुछ और कहना चाहेंगें।

महर्षि रमण जो अद्वैत वेदांत गुरु के नाम से प्रचलित हैं तिरुवन्नमलई नगर में अंतिम 53 वर्ष व्यतीत किए और 1950 में यहीं पर उनका देहांत हुआ। रमण के पिता वकील थे और 16 वर्ष की आयु से ही रमण को अरुणाचल पर्वत से अत्यंत प्रेम था। वह लोगो ने कतरा कर एकांत में साधना ,प्राथर्ना किया करते थे। उन्हें सभी जानवरों से अत्यंत प्रेम था। घर से भागकर पठाल लिंग नामक गुफा में एकांत साधना करने लगे। यह गुफा छिपकलियों,चींटियों और सांपों से भरी हुई थी। 25 वर्ष तक घोर तप साधना की ,आस पास के कई लोग गुरु मानकर उन्हें घेरे रहते थे। महर्षि ने आत्म विचार पर बहुत बल दिया है। आज करोड़ों में उनके अनुयायी सारे विश्व भर में फैले हुए हैं। जब हम आत्मविचार की बात करते हैं तो गुरुदेव द्वारा दिया गया विचार क्रांति सूत्र कैसे भूल सकते हैं। हमारे पाठक और सहकर्मी विचार क्रांति आंदोलन ( thought revolution ) से भलीभांति परिचित हैं। यह विचार ही हैं जो हमारे जीवन को अपने हिसाब से दिशा दिए जाते हैं। एक पल में ही हम आकाश में उड़ने लगते हैं और दूसरे ही पल हमारी चेतना ध्वस्त हो जाती है। गुरुदेव के जीवन से प्रेरित होकर लिखे जा रहे इन लेखों में जीवन जीने की कला छिपी हुई है। गुरुदेव के विशाल साहित्य का अपने अल्प विवेक और ज्ञान द्वारा अध्यन करके आपके समक्ष प्रस्तुत करना हमारा परमसौभाग्य है। इन लेखों को पढ़ कर आपकी समस्यायों का निवारण भी हो रहा है- आपके विस्तार पूर्वक दिए गए कमेंट, शेयर और फ़ोन कॉल्स इसके साक्षी हैं। इन सब के लिए हम आप के ऋणी रहेंगें।

आज के लिए बस इतना ही ,जय गुरुदेव

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