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हमारे पूज्य गुरुदेव का प्रकृति से स्नेह – रोते हुए पर्वत

हमारे पूज्य गुरुदेव का प्रकृति से स्नेह -आज हम गुरुदेव द्वारा लिखित बहुचर्चित पुस्तक ” सुनसान के सहचर ” में से एक दृश्य वर्णित करने का प्रयास करेंगें। गायत्री परिवार का शायद ही कोई परिजन होगा जिसने इस पुस्तक का अध्यन न किया हो और उन पलों को गुरुदेव के साथ -साथ हिमालय के बर्फीले पहाड़ों में जिया न हो। हम आज प्रयास करेंगें कि जिस प्रकार गुरुदेव ने अपने सहचरों के साथ स्नेहपूर्वक सानिध्य का आनंद उठाया वही भावना हम आपके ह्रदय तक उतारें। गुरुदेव की हिमालय यात्रा में उनके सहचर नदियां ,झरने ,फूल ,वृक्ष ,पर्वत ,बकरियां ,भेड़ें ,गगन ,गगन में सितारे इत्यादि सब उस परमपिता की ही कलाकृति ही तो हैं। इनके साथ हमारा स्नेह और सनिध्य होना स्वाभाविक है।

आगे चलने से पहले हम यह कहना चाहेंगें कि गुरुदेव के सारे साहित्य का मूल्य इतना कम है कि आपको विश्वास ही न हो। 119 पन्नों की पुस्तक ” सुनसान के सहचर ” का मूल्य केवल 15 रुपए है , चाय के एक कप के मूल्य से भी कम। Companion in solitude शीर्षक से यह पुस्तक इंग्लिश में भी उपलब्ध है। पिछले वर्ष हमने मथुरा की युग निर्माण योजना के प्रेस की कुछ videos शूट की थीं। कभी समय हुआ तो आपको अवगत करायेंगें कि करोड़ों रुपयों की मशीनों पर इतनी कम मूल्य वाली पुस्तकें कैसे छप रही हैं ,सारे process हमने एक एक करके ,पूरी बारीकी से शूट किये था।

गुरुदेव ने सामने पर्वत देखे , उन पर कुछ जल रुका पड़ा था। जल ऊपर से बर्फ के पिघलने के कारण पर्वत की दरारों में से रिस कर बूँद -बूँद बन कर नीचे टपक रहा था। हिमालय में ऐसे दृश्य अक्सर देखने में मिलते हैं। इधर उधर से धूल- मिटटी उड़ कर इन गीले पर्वतों पर चिपक जाती है। इस सारी क्रिया से कई जगहों पर हरी घास भी उग जाती है। गुरुदेव ने इस रिसते जल को अपनी भावना के अनुसार “आंसूं की बूँदें ” कहा। कहने लगे पर्वत रो रहे हैं। पर्वतों में हरी नरम ,कोमल घास को काई कहते हैं। गुरुदेव ने काई को आँखों में होने वाला कीचड़ की संज्ञा दी।

गुरुदेव अपनी कल्पना में जाये जा रहे थे। पर्वत से पूछने लगे -रो क्यों रहे हो भाई ,कई स्थानों पर तो उनके आंसू पोंछे भी । लेकिन वह पर्वत है ,पत्थर का बना हुआ पत्थर का दिल ,क्या उत्तर देता ,बोल थोड़े सकता था । परन्तु कल्पना रानी ने तो ज़िद लगाई थी , रोने का कारण जानने के लिए गुरुदेव की कल्पना कहने लगी –

अरे पर्वत राज तुम्हे क्या कष्ट है ,आंसू क्यों बहा रहे हो ? तुम तो बनश्री से लदे पड़े हो। सारी सम्पदा के मालिक हो ,स्थिर बैठे हो ,कोई भागदौड़ नहीं ,कोई चिंता नहीं ,बैठे बैठे आनंद के दिन व्यतीत करते हो ,इतना सब कुछ होते हुए भी रोते हो ,क्या बात है ?

पत्थर का पहाड़ अकड़ कर खड़ा था ,परन्तु फिर भी बोला और अपनी व्यथा कहने लगा :

बोला मेरे दिल का दर्द तुम्हें क्या मालूम? मैं बहुत ही ऊँचा हूँ ,वनश्री से लदा हूँ।,निश्चिन्त बैठा रहता हूँ। देखने को मेरे पास सब कुछ है, पर निष्क्रिय- निश्चेष्ट जीवन भी क्या कोई जीवन है। जिसमे गति नही, संघर्ष नहीं, आशा नहीं, स्कूर्ति नहीं, वह जीवित होते हुए भी मृतक के समान है। सक्रियता में ही आनन्द है। । इसे केवल अनजान लोग ही आराम और आनन्द कह सकते हैं। इस दृष्टि से क्रीड़ापन में जो जितना खेल लेता है,वह अपने को उतना ही तरो- ताजा और प्रफुल्लित अनुभव करता है। सुस्त तो कई बार अपनी भावनाओं के वशीभूत होकर हत्या करने की भी सोच लेता है

इस सृष्टि के सभी पुत्र प्रगति के पथ पर उल्लास भरे सैनिकों की तरह कदम पर कदम एक ही ताल से अपने जूतों को ठोकते हुए ,मोर्चे पर मोर्चा पार करते चले जाते हैं। दूसरी ओर मैं हूँ जो सारी सम्पदाएँ अपने पेट में छिपाए मौज की छान रहा हूँ। कल्पना बेटी तुम मुझे सेठ कह सकती हो, अमीर कह सकती हो भाग्यवान कह सकती हो पर हूँ तो मैं निष्क्रिय ही। निष्क्रिय का अर्थ हमारे पाठक जानते ही होंगें -इंग्लिश में defunct / unusable होता है । संसार की सेवा में अपने पुरुषार्थ का परिचय देकर लोग अपना नाम इतिहास में अमर कर रहे हैं , कीर्तिवान् बन रहे हैं, अपने प्रयत्न का फल दूसरे को उठाते देखकर गर्व अनुभव कर रहे हैं। पर मैं हूँ जो अपना वैभव अपने तक ही समेटे बैठा हूँ। इस आत्मग्लानि ( inferiorty complex ) से यदि मुझे रोना आता है, आँखो में आँसू बरसते और कीचड़ निकलते हैं तो उसमें अनुचित ही क्या है?

मेरी नन्ही- सी कल्पना ने पर्वतराज से बातें कर ली समाधान भी पा लिया, पर वह अभी भी खिन्न ही थी। बहुत देर तक यही सोचती रही,कैसा अच्छा होता यदि इतना बड़ा पर्वत अपने टुकड़े- टुकड़े करके अनेकों भवनों, सड़कों, पुलों के बनाने में खप सका होता। तब भले ही वह इतना बड़ा न रहता, सम्भव है ऐसा करने से उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता लेकिन तब वह वस्तुत: धन्य हो जाता। ऐसा करने से उसका बड़प्पन सार्थक हुआ होता। इन परिस्थितियों से वंचित रहने पर यदि पर्वतराज अपने को अभागा मानता है और अपने दुर्भाग्य को धिक्कारता हुआ सिर धुनकर रोता है तो उसके रोने का कारण तो है ही।

गुरुदेव ने अपने साहित्य में कई स्थानों पर तप का महत्व कितनी ही बार समझाया है। हम उस पर्वत की तरह निष्क्रिय जीवन व्यतीत करना चाहते हैं यां die in harness वाले असूल को अपनाना है। आज का युग ऐसा युग है जिसमें जो कोई कुछ भी करना चाहे कर सकता है केवल इच्छा शक्ति की ज़रूरत है ,साधन अपने आप बनते चले जाते हैं।

तो मित्रो कल्पना दीदी और पर्वत राज की नोकझोंक को यही विराम देते हैं इस आशा के साथ कि आप को अवश्य प्रेरणा मिली होगी ।

जय गुरुदेव

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