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उदासीन बाबा की कुटिया :

गोमुख में कोई रुकने का इंतेज़ाम नहीं है इसलिए अधिकतर लोग सुबह भोजवासा से चल कर शाम तक गोमुख से होकर वापिस आ जाते थे। कुछ युवकआपस में बातें कर रहे थे और प्रोग्राम बना रहे थे। सामने गुरुदेव को निश्चिंत बैठे देख कर कहने लगे -आप बड़े शांत बैठे हैं ,कहां ठहरे हैं। गुरुदेव ने कहा – यही कहीं। उन्होंने फिर पूछा -कहां ? गुरुदेव ने सामने उस पार कुटिया की और इशारा किया। वैसे ही एक कुटिया सामने दिखाई दे दी। वोह कहने लगे -लेकिन वहां तो कोई नहीं है। गुरुदेव ने इस बात का कोई ध्यान नहीं दिया। यह संकेत था कि गुरुदेव को उनकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यात्री इस संकेत को समझ गए और चले गए।

उदासीन बाबा की कुटिया :

जिस कुटिया की ओर गुरुदेव ने संकेत किया था उसमें उदासीन बाबा रहते थे। धारा पार करके गुरुदेव इस कुटिया में आ गए। उस दिन शाम की बात है :

गोमुख के ऊपर थोड़ा- थोड़ा अँधेरा छा रहा था। आस -पास के पक्षी चहचहाने के बाद अपने घोंसलों में लौट रहे थे। दौड़ने भागने वाले जानवर भी शांत होकर अपने ठिकानों में शरण ले रहे थे। इसके बाद गोमुख में नीरव शांति छा गयी। पास में बह रही धारा और हवाओं की सायं -सायं एक मनोहर वातावरण का आभास दे रहे थे। कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात थी , शायद दशमी तिथि थी ,चांदनी का कहीं कोई नामोनिशाँ नहीं था। आसमान साफ था। खुले आकाश में हज़ारों ,लाखों तारे टिमटिमा रहे थे। तारों की रौशनी लाखों मील की यात्रा कर धरती को छूती हुई फैल रही थी। धरती पर जहां -तहाँ चमकते जुगनू और आकाश में तारे। कितना मनोहर दृश्य गुरुदेव इतने से प्रकाश में आस -पास की चीज़ों को देखने लगे , कुटिया में चुपचाप बैठे थे ,नींद नहीं आ रही थी, रात के कोई साढ़े दस – ग्यारह बजे होंगें। गुरुदेव कुटिया से बाहर आकर गोमुख की धारा को निहारने लगे। मन हुआ कि बैठ जाएँ। पालथी मार कर बैठ गए। बैठे -बैठे धारा को निहारते ऐसा लगा कि दिखाई देना बंद हो रहा है। दृष्टि जल पर टिकी हुई थी और मानस पटल पर कोई और ही चित्र उभर रहे थे। इन बिम्बों में से एक सन्यासी युवक उभर रहा था। लग रहा था कि यह सन्यासी किसी गुफा में से निकल रहा है और उसी गुफा के पीछे जल धारा बह रही है। गुरुदेव ने उस सन्यासी को पहचानने का प्रयास किया फिर अपने आप को स्वयं ही कहा ” हो न हो यह राजा भागीरथ ही हैं जिन्होंने अपने पूर्वजों के लिए हज़ारों वर्ष प्रचंड तप किया था और माँ गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था। यहाँ अवतरित हुई गंगा 205 किलोमीटर की यात्रा करके देवप्रयाग में अलकनंदा के साथ मिलने के बाद माँ गंगा बन जाती है , वह माँ गंगा जो सदियों से मानवता को मोक्ष प्रदान कर रही है। कुछ देर इसी तरह बैठे गुरुदेव रात्रि के वातावरण में अपने ख्यालों में युवा सन्यासी को निहारते रहे लेकिन फिर एकदम विचार आया कि यह तो हज़ारों वर्ष पुरानी बात है ,यह मेरे मन का संशय ही होगा।

गुरुदेव को नींद तो आ नहीं रही थी, उठ कर उस बियाबान वन में कुछ देर टहलने लगे। अचानक लगा कि सामने से किसी के पदचाप सुनाई दिए। कुछ ही क्षण उपरांत पदचाप निकट आते हुए लगे। पदचाप की दिशा में देखा , तारों के प्रकाश में कुछ भी साफ न दिखाई दिया। कुछ पल बीते होंगें कि एक मानव आकृति के दर्शन हो गए। आरम्भ में तो कुछ धुंधली लगती हुई आकृति कुछ देर उपरांत साफ़ दिखाई देने लगी। किसी तपस्वी की आकृति प्रतीत होती थी। उनके आने पर प्रतीत हुआ कि कोई पवन का झोंका आया हो। स्फूर्तिवान व्यक्तित्व ,चमकती आँखें ,लम्बी जटाएं परन्तु मुंह पर कोई दाढ़ी मूंछ नहीं, लम्बे -लम्बे कान महात्मा बुद्ध की याद दिला रहे थे। गोमुख की इतनी शीत ऋतू में इन दिगम्बर सन्यासी , योगी के तन पर कोई वस्त्र न देख कर आश्चर्य भी हुआ और विश्वास भी कि इनका हमारे साथ कोई पुराना संबध है। गुरुदेव ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और योगी ने हाथ उठा कर प्रणाम को स्वीकार किया। गुरुदेव ने कुटिया की और संकेत करते हुए कहा -आप इस गुफा में विराजिए और मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिये। योगी ने जैसे गुरुदेव का अनुरोध सुना ही नहीं।
कहने लगे :

मैं आपका अभिवादन करने आया हूँ। जिस क्षेत्र में आपने जाना है वहां साधरण व्यक्तियों का जाना सम्भव नहीं है। जिस सत्ता ने आपको यहाँ बुलाया है मैं उन्ही का विनम्र शिष्य हूँ “

उन योगी ने अपना परिचय नहीं दिया। पूछने पर केवल इतना ही कहा –
” क्या गुरु भाई होना पर्याप्त नहीं है ? कुछ साधक मुझे उदासीन बाबा कहते हैं ”

उन्होंने बताया हिमालय का सिद्ध क्षेत्र यहीं से आरम्भ होता है। आज भी देवी देवता इस क्षेत्र में रहते हैं, कलियुग के प्रभाव से सिद्ध योगी इससे आगे वाले क्षेत्र में निवास करते हैं। समेरु पर्वत ,शिवलिंग पर्वत , और भी कई पर्वत मालाएं इस क्षेत्र को सुशोभित करती हैं। इस मार्ग की दुर्गमता का विवरण और बातें सुन कर गुरुदेव ने अपनी आशंका व्यक्त की। योगी ने यह भांप लिया और कहा –

” अगर दूसरे लोग इस प्रदेश को पार कर चुके हैं तो आप क्यों नहीं “
गुरुदेव कहने लगे ,” उन लोगों के पास तो सामर्थ्य और शक्ति है , हमारे पास ऐसे क्षेत्र में चलने का अभ्यास और अनुभव नहीं है “

इतना कह कर गुरुदेव थोड़ी देर रुके फिर सोच में डूब गए, उन्हें 30 वर्ष पूर्व की यात्रा का स्मरण हो आया। तब भी इस दुर्गम ,अगम्य ( inaccesible ) प्रदेश को दादा गुरु द्वारा भेजे हुए प्रतिनिधि ने कैसे आसानी से सम्पन्न कराया था । गुरुदेव चुप रहे ,उन्हें इस बात की कोई चिंता न रही कि मार्ग कितना कठिन , लम्बा और दुर्गम है। इधर योगी ने जब गुरुदेव के पांव की तरफ देखा तो बोले

” यहाँ तक पहुँचने में आपको बहुत कष्ट हुआ होगा ? ”

गुरुदेव के पांव पर पट्टियां बंधी हुई थी जो उन्होंने अपनी धोती को फाड़ कर बनाई थीं। इन दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए गुरुदेव के पांव में
छाले पड़ गए थे। कुछ छालों में तो पानी भी पड़ गया था। योगी ने पास से ही कुछ पत्तियाँ उतारीं और मसल कर गुरुदेव को ज़ख़्म पर मलने को कहा और कुछ हाथ में थमा दीं कि कुछ समय बाद इनको फिर से ज़ख्मों पर लगा देना। ( यह घटना हम एक पहले वाले लेख में बता चुके हैं परन्तु इसको मिस करना ठीक नहीं है )
ऊपर बर्फीले पहाड़ों की ओर जाते हुए योगी गुरुदेव को दाहिनी तरफ लेकर जा रहे थे। दो ढाई मील चले होंगें तो योगी कहने लगे इस पहाड़ के पार बद्रीनाथ केवल आठ मील रह जाता है। उस तरफ ही ” फूलों की घाटी ” है। हम अपने पाठकों को यह बताना चाहेंगें कि फूलों की घाटी का विस्तृत विवरण आने वाले किसी लेख में देंगें। इस समय इस घाटी का विवरण देने से आज के लेख का ट्रैक गुम जाने की सम्भावना है।

गुरुदेव इस मार्ग को देख कर एक बार फिर घबराये ,सोचने लगे ,इतनी सर्दी शरीर कैसे सहन करेगा, सोने और खाने पीने की क्या व्यवस्था होगी। धरती के स्वर्ग के बिल्कुल पास आकर ,भीतर प्रवेश किये बिना वापिस चले जाना कोई समझदारी तो नहीं है। गंगा तट से प्यासे लौट जायेंगें क्या ? ऋषिकेश से यहाँ तक आने में 170 मील यात्रा की और नौ -दस हज़ार फुट ऊंचाई पर चढ़े , अब इसके आगे 12 मील और यात्रा करके 9000 फुट और ऊपर जाना है। लेकिन इतनी कठिनाइयां सोचने के बावजूद दादागुरु का स्मरण होते ही सब आसान हो गया। ऐसे होते हैं गुरु। परन्तु समर्पण पहले होना आवश्यक है। अगर हम भी अपने गुरुदेव के प्रति समर्पित हैं तो उन्ही पर सब छोड़ देना चाहिए।

गुरुदेव योगी के साथ चुपचाप कुछ सोचते जा रहे थे फिर एकदम पूछने लगे :

” हम क्या फूलों की घाटी के क्षेत्र में जा रहे हैं ? “

योगी कहने लगे -नहीं ,हम सुमेरु पर्वत पर चल रहे हैं। 21000 फुट ऊंचाई पर स्थित यह वही सुमेरु पर्वत है जो पुराणों में वर्णित अमृत मंथन के समय प्रयोग किया गया था। एकदम हिम की चादर ओढ़े यह विशाल पर्वत अब रंग बिरंगे पुष्पों के परिधान पहने दिखने लगा।
ऊपर चोटी पर पहुँच कर योगी ने एक वृक्ष के नीचे बैठने को संकेत किया। गुरुदेव बैठ गए और सोचने लगे -अब योगी इधर से चले जायेंगें और वापिस नहीं आएंगें। योगी ने मुड़कर देखा और कहा :

“सच है ,मेरा कार्य यहीं तक था , इसके आगे गुरुदेव स्वंय ले जायेगें “

गुरुदेव वहीँ बैठे सोच में डूब गए। पहली बार यह मार्ग देखा था और यह भी पहली बार ही सुना है कि गोमुख से सुमेरु प्रदेश में इंद्रलोक का रास्ता खुलता है। गुरुदेव अपने ख्यालों में खो रहे थे कि पलकें मूंदने से नींद का आभास होने लगा।

कई साधरण पर्वतारोही यहाँ आकर अपना नुकसान उठा चुके हैं। आजकल तो पर्वतारोहण एक बहुत बड़ी hobby बन चुकी है। 8 दिवसीय trekking के लगभग 13000 – 14000 रुपए खर्च होते हैं।

आज का लेख यहाँ समाप्त।

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