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गुरुदेव सुमेरु पर्वत पर

 

आज के ज्ञान प्रसाद में हम सहकर्मियों के समक्ष अपनी रिसर्च के परिणाम स्वरूप एक वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। यह वीडियो आज के समय ( 2019 ) की हैं और आप देख सकते हैं कि यह यात्रा और मार्ग जो आज भी इतना कठिन है तो गुरुदेव के समय कैसा होगा। आज कल तो गोमुख जाते हुए यात्री अपने साथ ऑक्सीजन सिलिंडर ले जाते हैं और खाने और प्रवास का भी कुछ इंतेज़ाम है तो उस वक़्त क्या था। आशा है आप अपना ध्यान केंद्रित करके सुमेरु पर्वत को देखने का प्रयास भी करेंगें ,समुद्र तल से 21000 फुट की ऊंचाई पर जा रहे थे हमारे गुरुदेव। आज के लेख में आप इस वीडियो को देख कर उस समय की स्थिति का चित्रण करके गुरुदेव के साथ -साथ चलें। हो सकता कई सहकर्मी इस क्षेत्र के जानकार पहले से ही होंगें।

पिछले लेख में हमने गुरुदेव के पांव के छालों और ज़ख्मों का वर्णन किया था। किन परिस्थितियों में हमारे गुरुदेव देवभूमि में , आज वाले उत्तराखंड प्रदेश में यात्रा कर रहे थे। मार्ग में पहाड़ों से पथरों का गिरना बहुत ही साधारण सी बात है और पांव को काटने वाले तेज़ नुकीले पत्थर मार्ग को अति कठिन बनाते हैं। गोमुख तक पहुंचना ही कठिन था उसके आगे तो दादा गुरु (मार्गदर्शक ) के भेजे हुए प्रतिनिधि का सहारा होता था। इस बार भी मार्गदर्शक ने गुरुदेव का अभिनंदन किया। साथ चलते -चलते उनको भी गुरुदेव के पांव के ज़ख्म और उनके ऊपर बाँधी हुई पट्टियां दिख गयीं । कहने लगे

” यहाँ तक आने में आपको बहुत कष्ट सहन करना पड़ा है “

योगी ( प्रतिनिधि ) ने पास की झाड़ियों में से कुछ पत्तियाँ उखाड़ीं ,हाथों में मसला ,उन पत्तियों में से कुछ रस निकला। रस को ज़ख्मों पर मला और गुरुदेव को काफी आराम मिल गया। कुछ पत्तियाँ योगी ने गुरुदेव को थमा दीं और कहा -थोड़ी देर बाद यह भी मसल कर लगा लेना। उत्तराखंड देवभूमि की दिव्यता को परखने के लिए हनुमान जी ने संजीवनी तो लाई ही थी लेकिन गुरुदेव के ज़ख्मों का उपचार आज भी इस तथ्य को प्रमाणित करता है। जो लोग इस क्षेत्र में जा चुके हैं इस तथ्य से परिचित होंगें कि भारत का यह प्रदेश सचमुच में देवभूमि है ,यहाँ पर आज भी देवताओं का, दिव्य आत्मायों का वास है। हमारे पूज्यवर ने इन दिव्य आत्मायों के संरक्षण में इस विशाल गायत्री परिवार की उत्पति की है। आप हमारा कर्तव्य ,दायित्व और धर्म है कि हम अपने गुरुदेव को निराश न होने दें।

इतना दुर्गम रास्ता ,यां फिर कहें कि अगम्य ( inaccessible ) क्षेत्र में गुरुदेव कैसे चले गए थे। हमने कुछ समय पहले अपने चैनल पर एक वीडियो अपलोड की थी शीर्षक था – गुरुदेव की प्रथम हिमालय यात्रा -तीनो परीक्षाओं में उत्तीर्ण-। उस वीडियो में हमने बताया था कि गुरुदेव इस प्रदेश कि सारी कठिनाइयों से अपनी प्रथम यात्रा में परिचित एवं उत्तीर्ण हो गए थे। हम आग्रह करेंगें कि हमारे सहकर्मी इस वीडियो को भी अवश्य देखें ताकि उनको विस्तार से विदित हो जाये कि गुरुदेव ने कौन -कौन सी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। हो सकता है आपको भी अपने जीवन की कठिनाइयों का कुछ मार्गदर्शन मिल सके।
जय गुरुदेव


आज का लेख तो खत्म है परन्तु अपने एक परिजन का कमेंट आपके साथ शेयर करना चाहते हैं जिसमें गुरुदेव की तितिक्षा ( endurance ) का वर्णन है :
Kanaiyalal Trivedi
3 hours ago
I & others in shobhayatra saw p.p.gurudev sitting on luggage block on taxi in summer at noon at Ahmedabad railway station.when he had come for shaktipith pratista to save time.This was his titisha.

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