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कैसा है गुरुदेव का हिमालय :

हम अपने सहकर्मियों को ,ज्ञानरथ के सहकर्मियों को आभास दिलाने का प्रयास करेंगें कि गुरुदेव किन – किन विकट परस्थितियों में हिमालय क्षेत्र में, सिद्ध क्षेत्र में प्रवेश करते रहे। अपनी पुस्तक ” सुनसान के सहचर ” में उन्होंने कई परिस्थितियों का वर्णन किया है ,अगर एक- एक को discuss करना हो तो इसी पर कई लेख लिखे जा सकते हैं। उन वीरान ,भयानक जंगलों में, खूंखार जानवरों की उपस्थिति में , भयानक ऋतु में , उस प्रदेश में यही गुरुदेव के सहचर थे। सहचर का अर्थ यही होता है साथ -साथ चलने वाले। हम हर लेख को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं कि जो भी इन लेखों को पढ़े , जब भी पढ़े ,आज से दो वर्ष बाद भी पढ़े उसको यह आभास हो ,फील हो कि मैं भी गुरुदेव के साथ -साथ चल रहा हूँ। अगर गुरुदेव को दिव्य मार्गसत्ता का संरक्षण प्राप्त है तो हमें उनका संरक्षण अनवरत मिल रहा है। पूज्यवर ने इतनी साधना की ,इतना तप किया ,इतना अपने आप को पकाया – यह सब किसके लिए ,केवल हमारे लिए , अपने बच्चों के लिए, जितनी भी शक्ति ,ऊर्जा उन्होंने अर्जित की – सब हमारे लिए। उन्होंने तो अपने प्रवचनों में कई बार वर्णन किया है -मेरे बच्चों को केवल गाड़ी में बैठना ही है और स्टीयरिंग की तरफ ध्यान देना है। मैंने तो इस जीवन की गाड़ी में पेट्रोल तक डाल दिया है।

इस लेख में हम केवल दो परिस्थितियों का ही वर्णन करेंगें। यह दोनों दृष्टान्त अलग -अलग हैं परन्तु अत्यंत प्रेरणा और शिक्षा से भरपूर हैं।
हैं
1 ) तो आइये चलते हैं गुरुदेव के साथ -साथ :

गुरुदेव बहुत ही विकट रास्ते से जा रहे थे। मार्ग केवल 3 फुट चौड़ा ही था। नीचे गंगा बह रही थी , ऊपर पहाड़ खड़ा था। मार्ग इतना कठिन था कि अगर ज़रा सा भी पांव इधर -उधर हुआ तो नीचे गरजती हुई गंगा के गर्भ में जल-समाधि लेने में ज़रा भी विलम्ब न होता। और दूसरी तरफ सैंकड़ों फुट ऊँचा पर्वत सीना ताने खड़ा , एक भी इंच अपनी जगह से हटने को तैयार न था। मार्ग पर एक -एक कदम संभल कर रखना पड़ रहा था। जीवन और मृत्यु के बीच केवल डेढ़ फुट की दूरी थी। मृत्यु का डर कैसा होता है आज पहली बार उसका अनुभव हुआ है। मृत्यु के डर के बारे में एक पौराणिक कथा सुनी थी। तो आइये यात्रा को अल्पविराम देकर इस पौराणिक कथा को सुन लें।

राजा जनक ने शुकदेव जी को कर्मयोगी होने की स्थिति समझाने के लिए तेल का भरा कटोरा हाथ में देकर नगर के चारों ओर भृमण करते हुए वापिस आने को कहा ,साथ यह भी कह दिया यदि तेल की एक भी बूँद नीचे गिरी तो गर्दन काट दी जाएगी। राजा जनक ने सारे नगर को सजा दिया। शुकदेव जी तेल का कटोरा लेकर बड़ी सावधानी से सारे नगर का भृमण कर आए लेकिन तेल की एक भी बूँद नीचे न गिरी। उन्हें तेल के सिवाय और कुछ दिखाई ही नहीं दिया। राजा जनक ने कहा -जिस प्रकार मृत्यु के भय ने तेल की एक भी बूँद गिरने न दी और सारा ध्यान तेल के कटोरे पर ही रहा उसी प्रकार मैं भी मृत्यु को सदैव ध्यान में रखता हूँ। इससे कर्तव्य कर्म में न तो प्रमाद आता है और न व्यर्थ की भटकन मन को दुखित करती है। इस कथा का स्पष्ट और व्यक्तिगत अनुभव आज इस पगडंडी को पार करते हुआ। हम सभी लोग हँसते- बोलते जा रहे थे पर जब पगडंडी आरम्भ हुई तो सब चुप हो गए। इस पगडंडी पर चलते हुए किसी को घर की यां फिर किसी भी और बात का ध्यान नहीं आया। सबका ध्यान केवल एक ही बात पर था कि अगला कदम संभल कर और ठीक जगह पर पड़े। एक हाथ से हम पहाड़ को पकड़ते थे हालाँकि पहाड़ में पकड़ने वाला कुछ नहीं था। ऐसी मनोभूमि बनी हुई थी यदि शरीर की झोंक गंगा की तरफ होती तो संतुलन को ठीक रखने में पहाड़ को पकड़ -पकड़ कर चलने का उपक्रम कुछ तो सहायक होगा ही।

इन डेढ़ दो मील की यात्रा ने जीवन के कितने ही पाठ ( chapters ) पढ़ा दिए। हमारा जीवन एक बहुत बड़ा ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को समझने के लिए , इसके एक -एक chapter को समझने के लिए इस जीवन को जीना पड़ता है। कोई भी विद्यालय, कोई भी definite पाठ्यक्रम इसके लिए अपर्याप्त है। केवल जीना -जीना और जीना। We have to live this life and learn how to live।

यह विकट यात्रा पूरी तो हो गयी परन्तु अब भी कईं विचार मन में आ रहे हैं। हमारे पाठकों को यह शिक्षाप्रद अनमोल वचन बार -बार पढ़ कर अपने मन में ढाल लेने चाहिए।

अगर हम मृत्यु को निकट ही देखते रहें तो व्यर्थ की बातों पर मन दौड़ाने वाली मृगतृष्णाओं से बच सकते हैं। जीवन यात्रा भी आज की इस यात्रा की तरह है। इसमें भी हर कदम सोच समझ कर ,सावधानी से रखना पड़ता है यदि एक भी कदम गलती से रखा गया तो अथाह गर्त में गिर सकते हैं। अगर हमें जीवन से प्यार है तो, प्यार को चरितार्थ करने का केवल एक ही मार्ग है और वह है अपने आप को सही तरीके से चलाते हुए इस पगडंडी को पार कर लें, जहाँ से शांतिपूर्ण यात्रा पर चल पड़ें। हमारा जीवन भी उसी तरह उत्तरदाईत्वपूर्ण है जैसे गंगा तट पर यह खड़ी पगडंडी। कर्तव्य पालन की पगडंडी ऐसी ही है। धर्म के पहाड़ की दीवार को पकड़ – पकड़कर चलने पर हम अपना संतुलन बनाये रह सकते हैं जिससे खतरे की ओर झुक पड़ने का भय कम हो जाता है । आड़े समय में इस दीवार का सहारा ही हमारे लिए बहुत कुछ है। धर्म की आस्था भी लक्ष्य की मंज़िल को ठीक प्रकार से पार करने में कुछ हद तक सहायक मानी गयी है।

हम अपने पिछले लेखों में बता चुके हैं कि आचार्यश्री पहले यमनोत्री गए थे और वहां से फिर गंगोत्री ,गोमुख ,नंदनवन होते हुए हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में प्रवेश हुए थे। आम तौर पर लोग गंगोत्री से यमनोत्री जाते हैं। यहाँ गुरुदेव एक झरने की कथा से इतने प्रभावित हुए कि हम अपने सहकर्मियों के साथ शेयर किये बिना नहीं रह सकते।

2 ) तो आओ चलें गुरुदेव के साथ -साथ और देखें क्या है झरने कि कहानी

झरने की कहानी :

यमनोत्री के जिस क्षेत्र की हम बात कर रहे हैं वहां एक छोटा सा झरना था। उज्जवल जल माँ गंगा की उपस्थिति दर्शाता है। इस झरने के बारे में धारणा है कि महर्षि असित के लिए इस झरने ने अपने आप को यहाँ प्रकट किया था। बहुत प्राचीनकाल की बात है महृषि असित यहाँ आश्रम बना कर रहते थे। वे प्रतिदिन स्नान करने गंगोत्री जाते थे। स्नान के बाद यहां यमनोत्री आकर बाकि पूजा आराधना करते थे। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि गंगोत्री से यमनोत्री की दूरी 46 किलोमीटर है और प्रीतिदिन 92 किलोमीटर यात्रा करना ,क्या यह संभव है ? अवश्य संभव है। गुरुदेव ने साधना से सिद्धि की बात कई बार की है। यह सिद्ध पुरषों की बाते हैं। लेकिन संकल्प असम्भव को सम्भव बना देते हैं। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है हमारे सहकर्मियों ने नेशनल मीडिया पे यह समाचार अवश्य देखे होंगें जिनमें प्रवासी कामगर हज़ारों किलोमीटर पैदल ही चलते रहे। कोरोना वायरस की परिस्थिति ने उनको यह यातना सहने के लिए विवश करने के साथ -साथ उनकी संकल्प शक्ति की परीक्षा भी ले ली। ऑनलाइन ज्ञानरथ की ऐसे लोगों के साथ सदैव सहानुभूति रहेगी। कई लोगों का मत है कि महर्षि असित किसी छोटे रस्ते से जाते होंगे जिससे ज़्यादा समय नहीं लगता होगा। यह भी संभव हो सकता है परन्तु साधना की भावना को तो नकारा नहीं जा सकता है न। यमनोत्री में पूजा -पाठ कर रहे स्वामी योगानंद ने इस अंतर्कथा का वर्णन किया। उन्होंने बताया की महृषि असित जी जब वृद्ध हो गए तो इतनी दूर आना जाना कठिन हो गया। उनकी कठिनाई को देखते हुए माँ गंगा ने स्वयं अपने आप को इस झरने के रूप में यहाँ प्रकट कर दिया। झरने में स्नान करते कुछ युवकों ने योगानंद जी की बात विश्वास न किया तो उन्होंने कहा -तप से सब कुछ सम्भव हो सकता है। अगर साधना में निष्ठां हो तो आराध्य अपने नियम बदल देते हैं। जीवन शैली बदलने के कारण लोगों की आदतें भी बदलती चली जा रही हैं। भविष्य में लोग 2-3 किलोमीटर चलने में भी घबरायेगें। तो मित्रों आपने देखा 1928 की भविष्यवाणी कितनी सच हुई है। हम खुद देख सकते है आज कितने लोग पैदल चल सकते हैं। सुबह ,शाम का भर्मण , gym में भागना यां फिर प्रवासी कामगरों का पलायन अलग बाते हैं।

हमारे गुरुदेव ने इस चर्चा में एक और स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा:
चित्रकूट ,मन्दाकिनी और कामदगिरि की यात्रा करें तो देखेंगें कि भगवान राम जहाँ विश्राम करते थे ,सीता रसोई वहां से कुछ किलोमीटर दूर है, स्फटिक (quartz ) शिला भी इतनी ही दूर है। यह सब हमारी तुम्हारी बातें नहीं हैं, महामानवों की बाते हैं। गुरुदेव भी तो महामानव हैं ,उनकी शक्ति का आभास तो हम प्रतिदिन देख रहे हैं।

जय गुरुदेव

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