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बालक श्रीराम की हिमालय यात्रा

बालक श्रीराम की हिमालय यात्रा : चेतना की शिखर यात्रा 2

गुरुदेव की यह यात्रा उनके स्कूल टाइम की हैं ,आयु कोई लगभग 10 -12 वर्ष होगी। हमारे पाठक इस यात्रा को यथार्थ ( actual ) में न समझ कर केवल indicative ही समझें तो अधिक फीलिंग आएगी। तो कहानी कुछ इस प्रकार है :

बालक श्रीराम के ह्रदय में बचपन से ही हिमालय के लिए बहुत ही स्नेह था। यह घटना दादागुरु सवेश्वरानन्द जी से साक्षत्कार से कुछ वर्ष पूर्व की है। हमारे पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि गुरुदेव जन्म से ही एक सिद्धपुरष थे

कुछ समय पूर्व हमने अपने चैनल पर श्री दान कुंवरि इंटर कॉलेज आंवलखेड़ा में गुरुदेव के जन्म समारोह के उपलक्ष्य में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की वीडियो अपलोड की थी। उस कार्यक्रम में एक नाटक था जिसमें बालक श्रीराम घर से गायब हो गए ,काफी देर ढूंढने के बाद जब माँ ने पूछा बेटा राम तुम कहाँ चले गए थे तो बालक राम ने कहा -मैं हिमालय जा रहा था। जब हम इस लेख को लिखने की कड़ियाँ जोड़ रहे थे एक एक घटना ऐसे लग रही थी जैसे बाल गोपाल और जशोदा मैया के जीवन का आँखों देखा हाल चल रहा है, आशा करते हैं आप भी उसी भावना से इस लेख को अपने अंतःकरण में धारण करेंगें। हमारे पाठक जानते हैं कि दान कुंवरि जी गुरुदेव की माता जी का नाम है।

जिस आयु में बच्चे traditional खेल खेलते हैं ,श्रीराम साधना -साधना खेलते थे। यह कैसा खेल था ? बालक राम प्रातः-सायं संध्या और गायत्री जप करते और साथ में ध्यान भी करते। पाठशाला में भी अवकाश के समय साधना करते। कुछ 4 -5 साथी भी बना लिए थे जो साथ मिल कर साधना और जप करते थे। इस खेल का नाम ही उन्होंने साधना रख दिया था। सारे इक्क्ठे हो कर बैठ जाते ,आँखें बंद कर लेते और देखने को कहते, आँखें बंद और देखना , यह क्या था ? बालक राम उन्हें eyebrows के बीच वाले स्थान पर देखने को कहते। कहते मुझे तो सूर्य दिखाई दे रहा है ,बाकि के मित्र ऐसे ही कह देते। बाद में अगले चरण में गायत्री ,हिमालय ,गंगा ,जमुना ,सरस्वती ,सिद्ध संत वगैरह की बातें चल पड़तीं। कुछ दिन बाद वह अपने मित्रों के साथ जंगल भी जाने लगे ,और किसी वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यान करते।

एक बार श्रीराम अकेले ही गए और तीसरे पहर लौटे। पाठशाला का समय था, गुरूजी ने सोचा छात्र किसी काम से घर गया होगा। घर वालों ने समझा पाठशाला में ही होगा। जो साथी साधना -साधना खेल खेलते थे वह भी ढूंढ़ते रहे। तीसरे पहर उनके खेल का लीडर जब प्रकट हुआ तो पूछने पर पता चला कि पास में ही एक गुफा मिली है जिसमें बैठ कर ध्यान किया जा सकता है। अगले दिन साथियों को भी साथ ले गए। साथी जैसे -तैसे गुफा तक तो चले गए लेकिन अंदर जाने से सब डरने लगे। उनके लीडर ( बालक राम ) गुफा के अंदर चले गए और बाकि के बच्चे बाहर प्रतीक्षा करते रहे। घंटे -डेढ़ घंटे बाद जब श्रीराम बाहर आए तो छात्रों ने उलाहना दिया ,कहा आगे से इस खेल में शामिल नहीं होंगें। जब ताई जी ( गुरुदेव अपना माता जी को ताई कहते थे ) को पता चला तो उन्होंने श्रीराम को बहुत डांटा। श्रीराम चुप रहे लेकिन इस चुप्पी के पीछे सहम नहीं बल्कि माँ का विरोध नहीं करना था। श्रीराम पर कोई असर न देख कर ताई बोली – गुफा के आस -पास भी नहीं फटकना ,सुन लिया न -बोल नहीं जायेगा न । माँ की बात सुन कर बालक श्रीराम ने गर्दन हिलाई और माँ ने गले लगा लिया।

इसके बाद कोई दिन ऐसा न होगा जब बालक श्रीराम स्कूल न पहुंचे हों। कभी कोई काम पड़ गया हो तो वह अलग बात है। लेकिन आज का दिन कैसा था। सायं होने को आ गयी थी ,बालक राम का कहीं पता ही नहीं था। घर वापिस ही नहीं आए। माँ का दिल घबराने लगा। स्कूल जाकर पूछा क्या कोई ओवरटाइम की कक्षाएं चल रही हैं ? सभी घबराये, खोज करने लगे। सबको पहले उस गुफा का विचार आया जहाँ बालक श्रीराम कुछ समय पूर्व अपने साथियों के साथ चले गए थे। लेकिन माँ को विश्वास था की वहां नहीं जायेंगें ,माँ को न जाने का वचन तो दिया था। लेकिन फिर भी सभी ने सोचा एक बार देख ही लेते हैं। अष्टमी ,नवमी की रात होगी मद्धिम सी चांदनी होगी , अँधेरे में देखा जा सकता था ,फिर भी मशाल का इंतेज़ाम कर ही लिया। पिता रूपकिशोर ने गुफा के द्वार पर पहुँच कर आवाज़ लगाई ,अंदर से कोई वापिस आवाज़ न आने पर चिंता होने लगी।

हिमालय ही अपना घर :

गुफा से कोई आवाज़ न आने पर अंदर जाने का निश्चय किया। 10 -12 फुट लम्बी ,टेढ़ी -मेढ़ी गुफा के अंदर से कुछ न मिलने के कारण वापिस आ गए। इधर घर पर ताई का रो- रो कर बुरा हल हो गया था। खोज चलती रही अगला दिन भी आ गया। करीब सात बजे ताई के मायके से कोई सम्बन्धी आए। रुक्मणि प्रसाद नाम था और गांव के रिश्ते से ताई के चाचा लगते थे। वह तो रात को ही आ गए थे लेकिन लड़की के घर न रहने की प्रथा को निभाते हुए गांव के बाहर किसी मंदिर में ठहर गए थे। घर आते ही कोहराम देख कर पता चला कि घर का कुलदीपक लापता है। पता चलते ही रुक्मणि प्रसाद जी को एक दम ख्याल आया, कल शाम रस्ते में एक 10 -12 वर्ष का बच्चा देखा था ,अकेला ,निर्जन रास्ते पर जा रहा था। पूछा भी था -बेटा अकेले कहां जा रहे हो तो उत्तर दिया था –

” मैं हिमालय जा रहा हूँ “

उत्तर सुन कर रुक्मणीप्रसाद जी को आश्चर्य भी हुआ था और हंसी भी आयी थी। उनके मुंह से बरबस निकल आया था -नटखट कहीं का ,हिमालय कहीं पास है क्या ? सबसे पास अगर कोई पर्वत है तो वह है गोवर्धन और वह भी करीब 40 मील दूर। आंवलखेड़ा आकर पता चला कि वह बच्चा इसी घर का चिरंजीव है। रुक्मणि प्रसाद जी घर के कुछ अन्य लोगों के साथ उस जगह पर पहुंचे जहाँ बालक श्रीराम मिले थे। उस जगह होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। कोई 3 -4 मील आगे गए होंगें तो एक छोटा सा रेलवे स्टेशन मिला जहाँ हाथरस जाने वाली गाड़ी मिलती थी। हाथरस उस क्षेत्र का एक बड़ा नगर था। स्टेशन पर पूछा कि पिछली गाड़ी कब गयी थी तो पता चला कल दोपहर में। थोड़ी सांत्वना मिली कि बालक श्रीराम यहीं कहीं हैं। आस पास ढूँढा तो पता चला कि आस पास एक छोटी सी झील है। वहां गए तो क्या देखते हैं –

” बालक श्रीराम झील के किनारे बने शिवालय में ध्यानस्थ बैठे थे “

यह देख कर पिताश्री की जान में जान आयी। ध्यान समाप्त होने तक प्रतीक्षा की और आसन से उठते ही पुत्र को कस कर बाँहों में ले लिया और नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। पिता रूपकिशोर जी एक के बाद एक प्रश्न किये जा रहे थे :

क्या यह हिमालय जाने की आयु है ?
बिना बताये क्यों चले आए ?
माता पिता का ह्रदय दुखा कर भगवत- प्राप्ति कौन सा धर्म है ?

इतने प्रश्न पूछते -पूछते पिताश्री ने बेटे के सिर पर अश्रुओं की गंगा -जमुना बहा दी। पिताजी ने तो रो धो कर अपना ह्रदय दिखा दिया परन्तु ताई जी की रुलाई थम ही नहीं रही थी। माँ की रुलाई ने जन्म के समय आए साधु-संतों की भविष्यवाणियों को कोसना भी नहीं छोड़ा। बार -बार ताई उन साधु -संतों को कोसे जा रही थी जिन्होंने कहा था -यह बालक तप ,ध्यान साधना से प्रेरित होगा। माँ को दुखी देख कर बालक श्रीराम सांत्वना देने लगे और कहने लगे –

” माँ साधु -संतों को क्यों कोसते हो ? आपका ह्रदय मेरे कारण दुखी हुआ है आप मुझे कोसिये “

अपने आप को उत्तरदाई मानने पर माँ का रोना कुछ थमा तो रुआंसी सी आवाज़ में ताई बोलीं :
” अगर तुम मानते हो कि तुमने मुझे दुखित किया है तो एक वचन दो कि तू मुझे छोड़ कर कभी भी ,कहीं नहीं जायेगा। मुझे छोड़ कर साधु -सन्यासी बनने की बात कभी नहीं सोचेगा ,तुम हिमालय कि आत्मा हो तो हो परन्तु इस सब का मेरे बाद सोचना। मेरे लिए तुम केवल श्रीराम हो “
बालक श्रीराम ने माँ के एक -एक वाक्य को बड़े ध्यानपूर्वक सुना और कहा :
” माँ मैं आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा ,यहीं आपके पास ही रहूँगा। आपको ब्रजक्षेत्र बहुत पसंद है न ,आपको ठाकुर जी का घर बहुत भाता है “

पुत्र के आश्वासन भरे ,स्नेहपूर्ण शब्द सुन कर माँ शांत हो गयी। उनकी शांति में यह दृढ़ विश्वास था कि पुत्र ने जो कह दिया है उसका अक्षर -अक्षर पालन करेगा। उस दिन हवेली में उत्सव का वातावरण था। हो भी क्यों न ,माँ को आश्वासन मिला था उसका चिरंजीव कभी उससे दूर नहीं जायेगा ,कभी कार्य के प्रयोजन से प्रवास पर जाना पड़े तो अलग बात है वह विछोह में नहीं आता। ताई जी की आस्था और अपेक्षा पुत्र को गृहस्थी और अस्तित्व में रखने की थी और श्रीराम ने इसका विश्वास पूर्णरूप से दे दिया था।

तो मित्रों जैसे हमने लेख के आरम्भ में लिखा था कि यह घटना बालक श्रीराम और माँ ताई के बीच न होकर बाल गोपाल और यशोदा मैया के बीच समझी जाये तो अत्यंत आनंद विभोर होने की सम्भावना है।

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