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सुनसान वन में गुरुदेव की एक शाम

जिस प्रदेश में अपनी निर्जन कुटिया है, उसमें पेड़ पौधों के अतिरिक्त, जलचर, थलचर, नभचर जीव जन्तुओं
की भी बहुतायत हैं। जब भ्रमण को निकलते हैं तो अनायास ही उनसे भेंट करने का अवसर मिलता है। आरम्भ
के दिनों में वे डरते थे पर अब तो पहचान गये हैं। मुझे अपने कुटुम्ब का ही एक सदस्य मान लिया है। अब न वे
मुझ से डरते हैं और न अपने को ही उनसे डर लगता है। दिन-दिन यह समीपता और घनिष्ठता बढ़ती जाती है।
लगता है इस पृथ्वी पर ही एक महान् विश्व मौजूद है। इस विश्व में प्रेम, करुणा, मैत्री, सहयोग, सौजन्य, सौन्दर्य,
शान्ति, सन्तोष, आदि स्वर्ग के सभी चिह्न मौजूद हैं। उससे मनुष्य दूर है। उसने अपनी अलग ही एक छोटी सी
दुनिया बना रखी है जिसका नाम है
“मनुष्यों की दुनिया”
इस अहंकारी और दुष्ट प्राणी ने ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-
चौड़ी बातें बहुत की हैं। महानता और श्रेष्ठता के, धर्म और नैतिकता के लम्बे-चौड़े विवेचन किये हैं। पर सृष्टि के
अन्य प्राणियों के साथ उसने जो दुर्व्यवहार किया है उससे उस सारे पाखण्ड का पर्दाफाश हो जाता है जो वह
अपनी श्रेष्ठता, अपने समाज और सदाचार की श्रेष्ठता बखानते हुए प्रतिपादित किया करता है।
आज विचार बहुतगहरे उतर गये, रास्ता भूल गया, कितने ही पशु-पक्षियों को आंखें भर-भर कर देर तक देखता रहा। वे भी खड़ेहोकर मेरी विचारधारा का समर्थन करते रहे। मनुष्य ही इस सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी नहीं माना जा सकता कि उसके पास दूसरों की अपेक्षा बुद्धि और बल अधिक है। यदि बल ही बड़प्पन का चिह्न हो तो दस्यु, सामन्त, असुर, दानव, पिशाच, बेताल ब्रह्म राक्षस आदि की श्रेष्ठता को मस्तक नवाना पड़ेगा।
श्रेष्ठता के चिन्ह हैं :
सत्य, प्रेम, न्याय, शील, संयम, उदारता, त्याग, सौजन्य, विवेक, सौहार्द्र।
यदि इनका अभाव रहा तो बुद्धि का शस्त्र धारण किये हुए पशु प्रवृति वाला यह नर उन विकराल नख और दांतों वाले हिंसक पशुओं से कहीं अधिक भयंकर है। हिंसक पशु भूखे होने पर ही आक्रमण करते हैं। पर यह बुद्धिधारी नर -पशु तो तृष्णा और अहंकार के लिए ही भारी दुष्टताऔर क्रूरता का निरन्तर अभियान करता रहता है।
नित्य की तरह आज भी तीसरे पहर उस मनमोहक वन मेंभ्रमण के लिए निकला। भ्रमण में जहां स्वास्थ्य संतुलन की, व्यायाम की दृष्टि रहती है वहां सूनेपन के सहचर (साथी ) से, इस निर्जन वन में निवास करने वाले परिजनों से कुशलता पूछने और उनसे मिलकर आनन्द लाभ करने की भावना भी रहती है। अपने आपको मात्र मनुष्य जाति का सदस्य मानने वाली दृष्टि जब थोड़ी सी विस्तृतहोने लगी, तो वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी, कीट-पतंगों के प्रति भी ममता और आत्मीयता उमड़ी। ये परिजन मनुष्यकी बोली तो नहीं बोलते और न ही उनकी सामाजिक प्रक्रिया मनुष्य जैसी है, फिर भी अपनी विचित्रताओं और विशेषताओं के कारण इन प्राणियों की दुनिया भी अपने स्थान पर बहुत ही महत्वपूर्ण है।
जिस प्रकार धर्म, जति,रंग, प्रान्त, देश भाषा, भेष आदि के आधार पर मनुष्यों और मनुष्यों के बीच छोटी छोटी साम्प्रदायिकता फैली हुई हैं, वैसी ही एक संकीर्णता, ओछापन ,अनुदारता यह भी है कि
“आत्मा अपने आपको केवल मनुष्य जाति का सदस्य माने।”
अन्य प्राणियों को अपने से भिन्न जाति का समझे या उन्हें अपने उपयोग की, शोषण को वस्तु समझे। प्रकृति के अगणित पुत्रों में से मनुष्य भी एक है। माना कि उसमें कुछ अपने ढंग से विशेषताएं हैं पर
अन्य प्रकार की अगणित विशेषताएं सृष्टि के अन्य जीव-जन्तुओं में भी मौजूद हैं और वे भी इतनी बड़ी हैं कि
मनुष्य उन्हें देखते हुए अपने आपको पिछड़ा हुआ ही मानेगा।
आज भ्रमण करते समय यही विचार मन में उठरहे थे। आरम्भ में इन बियाबान वनों में जो सदस्य जीव-जन्तु और वृक्ष-वनस्पति तुच्छ लगते थे, महत्वहीन प्रतीतहोते थे, अब ध्यान पूर्वक देखने से वे भी महान् लगने लगे और ऐसा प्रतीत होने लगा कि भले ही मनुष्य को प्रकृति ने बुद्धि अधिक दे दी हो पर अन्य अनेकों उपहार उसने अपने इन निर्बुद्धि माने जाने वाले पुत्रों को भी दिये हैं। उन उपहारों को पाकर वे चाहें तो मनुष्य की अपेक्षा अपने आप पर कहीं अधिक गर्व कर सकते हैं।
1) इस प्रदेश में कितनी ही प्रकार की चिड़ियां हैं, जो प्रसन्नता पूर्वक दूर-दूर देशों तक उड़कर जाती हैं। पर्वतों को लांघती हैं। ऋतुओं के अनुसार अपने पंखों को ही बदल लेती हैं। क्या मनुष्य को यह उड़ने की विभूति प्राप्त हो सकी है? हवाई जहाज बनाकर उसने एक भोंड़ा प्रयत्न किया तो है पर चिड़ियों के पंखों से उसकी क्या तुलना हो सकती है? अपने आपको सुन्दर बनाने के लिए सजावट की रंग−बिरंगी वस्तुएं उनसे आविष्कृत की हैं पर चित्र-विचित्र पंखों वाली , स्वर्ग की अप्सराओं जैसी चिड़ियों और तितलियों जैसी रूप सज्जा उसे प्राप्त हुई है क्या ?
2) सर्दी से बचने के लिए लोग कितनी तरह के वस्त्रों का उपयोग करते हैं पर रोज ही आंखों के सामने गुजरने वाले जंगली भेड़ और रीछ के शरीर पर जमे हुए बालों जैसे गरम ऊनी कोट शायद अब तक किसी मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुए।
3) हर छिद्र से हर घड़ी दुर्गन्ध निकालने वाला मनुष्य सुगन्धि बिखेरने वाले पुष्पों से अपनी तुलना कर सकता है क्या ?
4) साठ-सत्तर वर्ष में जीर्ण-शीर्ण होकर मरखप जाने वाले मनुष्य की इन अजगरों से क्या तुलना की जाय जो तीन सौ वर्ष की आयु को हंसी खुशी पूरा कर लेते हैं।
5) वट और पीपल के वृक्ष तो एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।
6) कस्तूरी मृग जो सामने वाले पठार पर छलांग मारते रहते हैं, किसी भी मनुष्य को दौड़ में परास्त कर सकते हैं।
7) भूरे बाघों से मल्ल युद्ध में क्या कोई मनुष्य जीत सकता है?
8) चींटी की तरह अधिक परिश्रम करने की सामर्थ्य भला किस आदमी में होगी?
9) शहद की मक्खी की तरह फूलों में से कौन मधु संचय कर सकता है?
10) बिल्ली की तरह रात के घोर अन्धकार में देख सकने वाली दृष्टि किसे प्राप्त है?
11) कुत्तों की तरह सूंघने की शक्ति के आधार पर बहुत कुछ पहचान लेने की क्षमता भला किस को होगी?
12) मछली की तरह निरन्तर जल में कौन रह सकता है?
13) हंस के समान नीर-क्षीर विवेक किसे होगा? हंस की बुद्धि (विवेक ) इतनी तेज होती है कि उसको अगर दूध (क्षीर ) और जल (नीर ) मिला कर दिए जाएँ तो वह दूध पे लेता है I
14) हाथी के समान बल किसी व्यक्ति में है? 
“इन विशेषताओं युक्त प्राणियों के देखते हुए मनुष्य का यह गर्व करना मिथ्या मालूम पड़ता है कि वही संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।”
आज के भ्रमण में यही विचार मन में घूमते रहे कि मनुष्य ही सब कुछ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ भी नहीं है, सब का नेता भी नहीं है। उसे बुद्धि बल मिला, सही। उसके आधार पर उसने अपने सुख साधन बढ़ाये यह भी सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि इसे पाकर उसने अनर्थ ही किया। सृष्टि के अन्य प्राणी जो उसके भाई थे, यह धरती, उनकी भी माता ही थी, उस पर जीवित रहने, फलने फूलने और स्वाधीन रहने का उन्हें भी अधिकार था; पर मनुष्य ने सब को पराधीन बना डाला, सब की सुविधा और स्वतन्त्रता को बुरी तरह पददलित कर डाला।पशुओं को जंजीरों से कसकर उससे अत्यधिक श्रम लेने के लिए पैशाचिक उत्पीड़न किया, उनके बच्चों के हक का दूध छीनकर स्वयं पीने लगा, निर्दयता पूर्वक वध करके उनका मांस खाने लगा। पक्षियों और जलचरों के जीवन को भी उसने अपनी स्वाद प्रियता और विलासिता के लिए बुरी तरह नष्ट किया। मांस के लिए, दवाओं के लिए, फैशन के लिए, विनोद के लिए उनके साथ कैसा कैसा नृशंस व्यवहार किया है, उस पर विचार करने से दम्भी (अभिमानी ) मनुष्य की सारी नैतिकता मिथ्या ही प्रतीत होती है।
मित्रो यह जो आज की स्थिति हम सब देख रहे हैं गुरुदेव ने कई दशकों पूर्व ही अनुमानित कर ली थी। हम सभी अगर अकेले मैं बैठ कर चिंतन – मनन करें तो इस बात से सहमत होंगे की इस सृष्टि का प्रत्येक प्राणी ,जीव -जंतु, पेड़ पौधा कीट इत्यादि आदरणीय है और सभी का सम्मान करना हमारा धर्म है। हम भारतीय तो पुरातन समय से इस धारणा की पुष्टि करते आ रहे हैं और हमारे मार्गदर्शक हमें प्रेरणा देते आ रहे हैं। जय गुरुदेव

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